पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) से केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक को दुर्लभ नीलकुरिंजी झाड़ियों के संरक्षण के लिए वार्षिक कार्य योजना प्रस्तुत करने का निर्देश देने का अनुरोध किया है।

  • MoEFCC ने केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक को नीलकुरिंजी संरक्षण योजना पेश करने का निर्देश देने के लिए NGT से अपील की है।
  • नीलकुरिंजी एक दुर्लभ पौधा है जो केवल 12 वर्षों में एक बार खिलता है।
  • अनियंत्रित पर्यटन और बुनियादी ढांचे का विस्तार इस प्रजाति के लिए मुख्य खतरा है।
  • केंद्र सरकार 'वन्यजीव आवास विकास' योजना के तहत वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) से एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप की मांग की है। मंत्रालय ने अनुरोध किया है कि केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों को Strobilanthes kunthiana, जिसे लोकप्रिय रूप से नीलकुरिंजी के रूप में जाना जाता है, के संरक्षण के लिए एक विस्तृत वार्षिक कार्य योजना प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाए।

यह मामला तब उठा जब NGT ने नीलकुरिंजी को एक संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में चिह्नित करने वाली रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि 1832 से 2018 के बीच, यह दुर्लभ झाड़ी पश्चिमी और पूर्वी घाट के विभिन्न क्षेत्रों जैसे ब्रह्मगिरि, नीलगिरी, पलानी-कोडाइकनाल, अनामालई, मुन्नार-इडुक्की और येरकाउड-शेवरॉय में पाई गई थी।

क्यों यह महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि नीलकुरिंजी का अस्तित्व केवल एक पौधे का अस्तित्व नहीं है, बल्कि पश्चिमी घाट के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र का संकेतक है। यदि इस प्रजाति का संरक्षण नहीं किया गया, तो यह जैव विविधता का एक अमूल्य हिस्सा हमेशा के लिए खो सकता है।

नीलकुरिंजी का संरक्षण पश्चिमी घाट की पारिस्थितिक अखंडता को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।

जवाहरलाल नेहरू ट्रॉपिकल बॉटैनिकल गार्डन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (JNTBGRI) की रिपोर्ट के अनुसार, अनियंत्रित पर्यटन और बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार इस प्रजाति के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है। संस्थान ने सुझाव दिया है कि प्रजाति-विशिष्ट संरक्षण योजना के तहत जीवन-चक्र जीव विज्ञान और आवास आवश्यकताओं को एकीकृत किया जाना चाहिए।

संरक्षण के प्रमुख उपाय

JNTBGRI ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • जनसंख्या गतिशीलता का आकलन करने के लिए दीर्घकालिक पारिस्थितिक निगरानी प्लॉट स्थापित करना।
  • आक्रामक विदेशी प्रजातियों को हटाकर और देशी वनस्पतियों को फिर से लगाकर घास के मैदानों का पुनरुद्धार करना।
  • पर्यटन के लिए 'वहन क्षमता' (Carrying Capacity) का आकलन करना और फूलों के मौसम के दौरान सख्त नियम लागू करना।

वित्तीय मोर्चे पर, मंत्रालय ने बताया कि 'वन्यजीव आवास विकास' परियोजना के तहत केरल को वर्ष 2025-26 के लिए ₹5.9 करोड़ और 2024-25 में ₹9.09 करोड़ की सहायता प्रदान की गई है। मंत्रालय की भूमिका एक सुविधाप्रदाता और वित्त पोषण एजेंसी के रूप में है, जो तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करती है।

Did You Know?: नीलकुरिंजी का पौधा पश्चिमी घाट में हर 12 साल में केवल एक बार खिलता है, जिससे यह दुनिया के सबसे दुर्लभ प्राकृतिक दृश्यों में से एक बन जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. नीलकुरिंजी क्या है?
यह पश्चिमी घाट का एक स्थानिक (endemic) पौधा है जो हर 12 साल में एक बार खिलता है।

2. इसके अस्तित्व को क्या खतरा है?
अनियंत्रित पर्यटन, बुनियादी ढांचे का विस्तार और आक्रामक विदेशी वनस्पतियां इसके मुख्य खतरे हैं।