वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने पराली जलाने की घटनाओं का सटीक आकलन करने के लिए ISRO के साथ मिलकर एक नया 'ग्राउंड ट्रूथिंग' प्रोटोकॉल विकसित करने की योजना बनाई है।
- CAQM, पंजाब और हरियाणा सरकारों के साथ पराली जलाने के आकलन प्रोटोकॉल में सुधार के लिए चर्चा कर रहा है।
- उपग्रहों द्वारा दर्ज की जाने वाली 'फायर काउंट' (आग की संख्या) हमेशा सटीक नहीं होती है।
- ISRO के साथ मिलकर 'ग्राउंड ट्रूथिंग' के जरिए वास्तविक प्रदूषण स्तर को मापने का प्रयास किया जाएगा।
दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान बढ़ते वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की तैयारियों के बीच, कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। CAQM के अध्यक्ष राजेश वर्मा ने घोषणा की है कि आयोग पराली जलाने की घटनाओं की सटीक निगरानी के लिए पंजाब और हरियाणा के अधिकारियों के साथ गहन चर्चा कर रहा है।
वर्तमान में, पराली जलाने की घटनाओं का डेटा मुख्य रूप से उपग्रहों (Satellites) के माध्यम से प्राप्त 'फायर काउंट' पर निर्भर करता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह डेटा भ्रामक हो सकता है। राजेश वर्मा के अनुसार, उपग्रहों से मिलने वाली जानकारी खेत में लगी आग की वास्तविक सीमा का सटीक चित्र प्रस्तुत नहीं करती है। इसी समस्या के समाधान के लिए CAQM अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के साथ मिलकर बेहतर 'ग्राउंड ट्रूथिंग' प्रोटोकॉल विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि पराली जलाने की समस्या केवल आग की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे निकलने वाले धुएं और कणों (Particulate Matter) की मात्रा अधिक महत्वपूर्ण है। अक्टूबर और नवंबर के महीनों में, जब मानसून वापस लौट रहा होता है, तब पश्चिमी हवाएं रुक जाती हैं, जिससे वाहनों, उद्योगों और कृषि अपशिष्ट से निकलने वाला प्रदूषण दिल्ली-एनसीआर में जमा होने लगता है।
अध्ययनों से पता चला है कि हालांकि पूरे सर्दियों के दौरान पराली जलाने का योगदान कुल प्रदूषण में 15% तक होता है, लेकिन कुछ विशिष्ट हफ्तों के दौरान यह हिस्सा बढ़कर 44% तक पहुंच सकता है। यह वायु गुणवत्ता को खतरनाक स्तर तक गिरा देता है।
उपग्रह सेंसरों का रिज़ॉल्यूशन और पराली की नमी, मात्रा और दहन दक्षता जैसे कारक प्रदूषण के स्तर को निर्धारित करते हैं, जिन्हें केवल उपग्रहों से मापना कठिन है।
ऐतिहासिक रूप से, पराली जलाने की समस्या को लेकर डेटा में विसंगतियां देखी गई हैं। 2024 के साक्ष्य बताते हैं कि पंजाब सरकार द्वारा पराली जलाने में 90% की कमी के दावे अतिरंजित हो सकते हैं। इसका एक मुख्य कारण यह है कि किसान उपग्रहों की पकड़ से बचने के लिए दोपहर के बजाय शाम के समय खेतों में आग लगा रहे हैं। ISRO के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के अध्ययन ने पाया कि 2020 में आग की चरम गतिविधि दोपहर 1:30 बजे होती थी, जो 2024 तक शाम 5:00 बजे तक पहुंच गई।
तुलनात्मक डेटा: फायर काउंट बनाम बर्न एरिया
| मापदंड (Parameter) | फायर काउंट (Fire Count) | बर्न एरिया (Burnt Area) |
|---|---|---|
| परिभाषा | आग की घटनाओं की संख्या | जली हुई भूमि का वास्तविक क्षेत्रफल |
| सटीकता | कम (उपग्रह की दृष्टि पर निर्भर) | मध्यम (क्षेत्रफल का बेहतर अनुमान) |
| प्रदूषण का आकलन | सीमित | बेहतर, लेकिन उत्सर्जन कारकों की आवश्यकता |
iForest जैसे शोध संस्थानों ने पाया है कि 'बर्न एरिया' (जली हुई भूमि का क्षेत्रफल) का डेटा अधिक सटीक तस्वीर पेश करता है। 2022 में यह लगभग 31,500 वर्ग किमी था, जो 2025 तक घटकर 19,700 वर्ग किमी रह गया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. CAQM क्या है?
यह दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए जिम्मेदार एक प्रमुख नियामक संस्था है।
2. 'ग्राउंड ट्रूथिंग' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है उपग्रह डेटा की सत्यता की जमीनी स्तर पर भौतिक जांच करना ताकि डेटा की सटीकता सुनिश्चित हो सके।