सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPC) ने अरावली पर्वत श्रृंखला की वैज्ञानिक परिभाषा तय करने के लिए फरवरी 2027 तक का समय मांगा है। समिति का कहना है कि केवल ऊंचाई के आधार पर अरावली का निर्धारण करना गलत होगा।
- HPC ने अरावली के लिए 'इकोसिस्टम लैंडस्केप' फ्रेमवर्क का प्रस्ताव दिया है।
- समिति ने रिपोर्ट पूरी करने के लिए 28 फरवरी 2027 तक का विस्तार मांगा है।
- केवल 100-मीटर की ऊंचाई वाली परिभाषा से 90% अरावली पहाड़ियों के बाहर होने का खतरा है।
- अध्ययन में जैव विविधता, जल प्रणालियों और सामाजिक-आर्थिक कारकों को शामिल किया जाएगा।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPC) ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट पेश करते हुए कहा है कि अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं को केवल एक एकल मापदंड (yardstick) के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता है। समिति ने चेतावनी दी है कि जल्दबाजी में जारी किए गए क्षेत्र के अनुमानों से गंभीर पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक परिणाम हो सकते हैं।
समिति ने 31 अगस्त को शीर्ष अदालत में एक अनुपालन रिपोर्ट सौंपी और वैज्ञानिक रूप से पुख्ता मूल्यांकन पूरा करने के लिए 28 फरवरी 2027 तक छह महीने का विस्तार मांगा है। समिति का प्रस्ताव है कि अरावली को केवल अलग-अलग पहाड़ियों के संग्रह के रूप में देखने के बजाय, एक 'अरावली इकोसिस्टम लैंडस्केप' (Aravalli Ecosystem Landscape) के रूप में देखा जाना चाहिए, जो आपस में जुड़ी पारिस्थितिक प्रणालियों का प्रतिनिधित्व करता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि अरावली की परिभाषा केवल भूगोल का मामला नहीं है, बल्कि यह खनन, संरक्षण और करोड़ों लोगों की आजीविका से सीधे जुड़ा विषय है। यदि अरावली को केवल 100 मीटर की ऊंचाई के आधार पर परिभाषित किया जाता है, तो बड़ी मात्रा में पहाड़ियां कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकती हैं, जिससे अवैध खनन और पर्यावरण विनाश का रास्ता खुल जाएगा।
अरावली को केवल मिट्टी और पत्थर के ढेर के रूप में देखना भूल होगी; यह एक जीवित पारिस्थितिक तंत्र है जो उत्तर भारत के जल विज्ञान को नियंत्रित करता है।
विवाद की जड़ में वह रिपोर्ट है जिसमें 100-मीटर की ऊंचाई के थ्रेशोल्ड का सुझाव दिया गया था। पूर्व में, भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) ने चेतावनी दी थी कि इस मानदंड से लगभग 90% अरावली पहाड़ियां बाहर हो जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2010 में इस 100-मीटर के बेंचमार्क को खारिज कर दिया था।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भविष्य की योजना
HPC अब Copernicus 30-metre digital elevation model और अन्य उच्च-रिज़ॉल्यूशन डेटा का उपयोग करके अरावली के परिदृश्य का मानचित्रण कर रही है। इस अध्ययन में केवल ऊंचाई ही नहीं, बल्कि निम्नलिखित कारकों को भी शामिल किया जाएगा:
- वन क्षेत्र और जैव विविधता
- जल पुनर्भरण क्षेत्र (Groundwater-recharge zones)
- पारंपरिक चरागाह और 'ओरण' (Sacred groves)
- सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व के स्थल
समिति ने अलवर, अजमेर और उदयपुर जैसे जिलों में प्रारंभिक परीक्षण किए हैं। इसके बाद, परिणामों को ISRO और राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) जैसे संस्थानों द्वारा सत्यापित किया जाएगा।
Frequently Asked Questions
1. समिति ने समय विस्तार क्यों मांगा है?
समिति एक ऐसा वैज्ञानिक ढांचा तैयार करना चाहती है जो पारदर्शी हो और जिसमें केवल ऊंचाई नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी और सामाजिक-आर्थिक कारकों को भी शामिल किया गया हो।
2. 100-मीटर की परिभाषा क्यों विवादित है?
क्योंकि इस मानक के लागू होने से अरावली का एक बहुत बड़ा हिस्सा (लगभग 90%) संरक्षित श्रेणी से बाहर हो सकता है, जिससे अवैध खनन को बढ़ावा मिल सकता है।