भुवनेश्वर में विश्व हेपेटाइटिस दिवस का आयोजन हुआ, जहाँ विशेषज्ञों ने गलत सूचना और सामाजिक कलंक को समाप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया। एआईआईएमएस के डॉक्टरों ने प्रारंभिक स्क्रीनिंग को बचाव की कुंजी बताया।

मुख्य बिंदु

  • भुवनेश्वर में विश्व हेपेटाइटिस दिवस का आयोजन
  • झूठी जानकारी और कलंक हटाने की अपील
  • एआईआईएमएस विशेषज्ञों ने समय पर स्क्रीनिंग को जीवनरक्षक बताया

भुवनेश्वर में 19 अक्टूबर को विश्व हेपेटाइटिस दिवस के उपलक्ष्य में एक व्यापक कार्यक्रम आयोजित किया गया। स्वास्थ्य मंत्रालय, एआईआईएमएस ओडिशा और स्थानीय NGOs ने मिलकर इस दिन को जागरूकता, रोकथाम और रोगियों के समर्थन के लिए समर्पित किया।

कार्यक्रम में प्रमुख वक्ता डॉ. अनीता पांडे, एआईआईएमएस ओडिशा के हेपेटोलॉजी विशेषज्ञ, ने बताया कि भारत में हर साल लगभग 2.5 लाख लोग हेपेटाइटिस से प्रभावित होते हैं, और शुरुआती स्क्रीनिंग से मृत्युदर में 60% तक कमी लाई जा सकती है। उन्होंने कहा, "सही समय पर रक्त परीक्षण ही रोग की पहचान का सबसे प्रभावी तरीका है।"

भू‑विज्ञान विभाग के प्रतिनिधियों ने कहा कि सामाजिक कलंक कई रोगियों को उपचार से दूर रखता है। इसलिए, सार्वजनिक जागरूकता अभियानों को स्थानीय भाषा में चलाना आवश्यक है, ताकि लोग बिना डरे जांच करवाएँ।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

विश्व हेपेटाइटिस दिवस की शुरुआत 2010 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा की गई थी, जिसका उद्देश्य हेपेटाइटिस के प्रति जागरूकता बढ़ाना और 2030 तक रोग को समाप्त करना था। भारत में इस दिन को विशेष महत्व मिला, क्योंकि यहाँ के स्वास्थ्य आंकड़े वैश्विक औसत से अधिक हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि भुवनेश्वर जैसे शहरी केंद्रों में जागरूकता कार्यक्रम सीधे रोगियों के स्क्रीनिंग दर को बढ़ाते हैं, जिससे राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति में गति मिलती है।

"हेपेटाइटिस को रोकने का सबसे बड़ा हथियार जनजागरूकता और समय पर परीक्षण है," डॉ. अनीता पांडे ने कहा।
क्या आप जानते हैं?: हेपेटाइटिस बी की वैक्सीन 1986 में विकसित हुई थी, और आज यह 190 से अधिक देशों में उपलब्ध है।

Frequently Asked Questions

  • हेपेटाइटिस की शुरुआती जांच कैसे करवाई जा सकती है? निकटतम स्वास्थ्य केंद्र में रक्त परीक्षण कराकर आप मुफ्त में स्क्रीनिंग करवा सकते हैं।
  • कलंक हटाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं? स्थानीय मीडिया और स्कूलों में शैक्षिक कार्यशालाओं के माध्यम से जागरूकता बढ़ाई जा रही है।