15 वर्षीय तन्वी पारियानी की दुखद मृत्यु ने भारत में बाल हृदय देखभाल (पीडियाट्रिक कार्डिएक केयर) में होने वाली अत्यधिक देरी पर देश का ध्यान आकर्षित किया है। भारत में हर साल जन्मजात हृदय दोष (CHD) के साथ पैदा होने वाले 2.5 लाख से अधिक बच्चों के लिए समय पर निदान और उपचार न मिलना जानलेवा साबित हो रहा है। विशेषज्ञों ने जीवन रक्षक सर्जरी में इस अंतर को पाटने के लिए तत्काल नीतिगत सुधारों की मांग की है।

  • भारत में हर साल 2.5 लाख से अधिक बच्चे जन्मजात हृदय दोष (CHD) के साथ पैदा होते हैं।
  • प्रसवपूर्व निदान (Antenatal Detection) की दर भारत में केवल 20% है, जिससे उपचार में अत्यधिक देरी होती है।
  • समय पर सर्जरी न होने से वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (VSD) जैसी बीमारियां असाध्य (Inoperable) हो जाती हैं।

15 वर्षीय तन्वी पारियानी की हाल ही में हुई दुखद मृत्यु ने भारत में पीडियाट्रिक कार्डिएक केयर (बाल हृदय देखभाल) के बुनियादी ढांचे में मौजूद गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। तन्वी ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा जन्मजात हृदय रोग (Congenital Heart Defect) के साथ संघर्ष करते हुए बिताया। उनके परिवार का दावा है कि वे बचपन से ही उनके इलाज के लिए अस्पतालों के चक्कर काट रहे थे, इस उम्मीद में कि एक दिन उनकी सुधारात्मक सर्जरी (Corrective Surgery) होगी। हालांकि, एम्स (AIIMS) प्रशासन का कहना है कि तन्वी के दिल की शारीरिक संरचना अत्यधिक जटिल थी, जिसके कारण डॉक्टरों ने अंततः सर्जरी को व्यवहार्य नहीं माना। तन्वी ने 1 सितंबर को एम्स में अंतिम सांस ली।

तन्वी का यह मामला भारत में जन्मजात हृदय दोष के साथ पैदा होने वाले लाखों बच्चों की स्थिति पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। कोलकाता के बी.एम. बिड़ला हार्ट रिसर्च सेंटर के डॉक्टर कुंतल रॉय चौधरी के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 2.5 लाख या उससे अधिक बच्चे जन्मजात हृदय दोष के साथ पैदा होते हैं। हालांकि पिछले दो दशकों में भारत ने इस क्षेत्र में काफी प्रगति की है, लेकिन देश की वर्तमान चिकित्सा क्षमता और मरीजों की वास्तविक संख्या के बीच एक बहुत बड़ा अंतर मौजूद है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में पीडियाट्रिक कार्डिएक सर्जरी को हमेशा से एक उपेक्षित क्षेत्र के रूप में देखा गया है। समस्या केवल सर्जनों की कमी या तकनीकी सीमाओं की नहीं है। एक बीमार बच्चे को विशेषज्ञ कार्डिएक सेंटर तक पहुंचने से पहले ही निदान में देरी, विशेषज्ञ सुविधाओं की कमी, वित्तीय तंगी और परिवारों में जागरूकता की कमी के कारण बहुत लंबा इंतजार करना पड़ता है, जो उनके लिए जानलेवा साबित होता है।

मानक (Parameter)शीघ्र निदान और उपचारदेरी से निदान और उपचार
पहचान का चरणप्रसवपूर्व (गर्भावस्था के दौरान) या जन्म के शुरुआती हफ्तों मेंलक्षण विकसित होने के बाद (महीनों या वर्षों बाद)
बच्चे की स्थितिस्थिर, नियंत्रित, सर्जरी के लिए तैयारगंभीर जटिलताएं, संक्रमण, सांस लेने में विफलता
सर्जरी की सफलता दरउच्च (जैसे, वीएसडी के लिए 98-99%)कम, या स्थिति पूरी तरह से असाध्य (Inoperable) हो जाती है

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारत के स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढांचे को विशिष्ट पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी में भारी मांग-आपूर्ति असंतुलन का सामना करना पड़ रहा है। जबकि वयस्क हृदय देखभाल में व्यावसायिक विस्तार देखा गया है, पीडियाट्रिक कार्डिएक सर्जरी वित्तीय रूप से अत्यधिक खर्चीली और ग्रामीण क्षेत्रों में कम सुलभ बनी हुई है। यह असमानता रोके जा सकने वाले बच्चों की मौतों को रोकने के लिए एक केंद्रीकृत, रियायती पीडियाट्रिक कार्डिएक रजिस्ट्री और क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्रों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।

"भारत में बाल हृदय चिकित्सा की त्रासदी सर्जिकल विशेषज्ञता की कमी नहीं है, बल्कि बच्चे के ऑपरेशन टेबल तक पहुंचने से पहले कीमती समय का नष्ट हो जाना है।" - डॉ. सुधुरी, पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट

चिकित्सकीय रूप से, कुछ हृदय दोषों के लिए समय पर उपचार बेहद नाजुक होता है। उदाहरण के लिए, वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (VSD) यानी दिल में छेद होने पर बच्चों को तीन से चार महीने की उम्र में ही सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है। यदि इस उपचार में देरी होती है, तो बच्चे में गंभीर पल्मोनरी हाइपरटेंशन विकसित हो सकता है। एक बार जब यह बीमारी गंभीर चरण में पहुंच जाती है, तो सर्जरी करना असंभव हो जाता है। यह अत्यंत दुखद है क्योंकि यदि सही समय पर सर्जरी की जाए, तो इसकी सफलता दर 98% से 99% तक होती है।

क्या आप जानते हैं?: भारत में जन्मजात हृदय दोष से पीड़ित केवल 20% बच्चों का ही जन्म से पहले (Antenatal) पता चल पाता है, जबकि विकसित देशों में यह दर 80% से अधिक है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: जन्मजात हृदय दोष (CHD) क्या है और यह कितना आम है?
उत्तर: जन्मजात हृदय दोष (CHD) जन्म के समय से ही दिल की संरचना में होने वाली गड़बड़ी है। भारत में हर साल लगभग 2.5 लाख बच्चे इस समस्या के साथ पैदा होते हैं, जिनमें से 25% से 30% को जीवन के पहले वर्ष में ही सर्जरी की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2: भारत में पीडियाट्रिक कार्डिएक सर्जरी में इतनी देरी क्यों होती है?
उत्तर: इसके मुख्य कारणों में प्रसवपूर्व स्क्रीनिंग की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और इकोकार्डियोग्राफी सुविधाओं का न होना, अत्यधिक वित्तीय लागत और परिवारों में जागरूकता की कमी शामिल हैं।