खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों ने पैकेज्ड फूड पर चीनी, नमक और वसा की स्पष्ट चेतावनी देने वाले 'फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग' (FoPL) की पुरजोर वकालत की है, ताकि उपभोक्ता स्वास्थ्य के प्रति सचेत रह सकें।

  • 80% से अधिक उपभोक्ता पैकेज्ड फूड पर स्पष्ट पोषण संबंधी चेतावनी चाहते हैं।
  • विशेषज्ञों ने चेतावनी लेबलों के चरणबद्ध कार्यान्वयन (Phased Implementation) का विरोध किया है।
  • अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स के भ्रामक मार्केटिंग विज्ञापनों पर रोक लगाने की मांग उठी है।

भारत में पैकेज्ड फूड की बढ़ती खपत के बीच, फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FoPL) को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ गई है। हाल ही में आयोजित एक पैनल चर्चा में खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि उपभोक्ताओं को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वे क्या खा रहे हैं। लोकलसर्कल्स के संस्थापक सचिन तपड़िया ने एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बताया कि 80% से अधिक भारतीय उपभोक्ता चाहते हैं कि उच्च चीनी, नमक और वसा वाले उत्पादों पर स्पष्ट चेतावनी लेबल हों।

चर्चा के दौरान, प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ और 'न्यूट्रिशन एडवोकेसी इन पब्लिक इंटरेस्ट' के संयोजक डॉ. अरुण गुप्ता ने सरकार और FSSAI द्वारा प्रस्तावित कुछ ढीले नियमों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने विशेष रूप से चेतावनी लेबलों के 'चरणबद्ध कार्यान्वयन' का विरोध किया, जिसे वे उद्योग जगत के हितों को साधने का एक तरीका मानते हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में गैर-संचारी रोगों (NCDs) जैसे मधुमेह और उच्च रक्तचाप में तेजी से वृद्धि हो रही है। जब तक FSSAI सख्त नियम लागू नहीं करता, तब तक कंपनियां 'हेल्थी' होने का दावा करने वाले भ्रामक विज्ञापनों के जरिए उपभोक्ताओं को गुमराह करती रहेंगी। यह मुद्दा केवल लेबलिंग का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल का है।

"दुनिया में कहीं भी ऐसा प्रयास नहीं किया गया है कि चेतावनी लेबलों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए; यह केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य से समझौता करना है।"

विशेषज्ञों का तर्क है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के लिए सख्त नियमों की तत्काल आवश्यकता है। वर्तमान में, पोषण संबंधी जानकारी पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में लिखी होती है, जिसे आम उपभोक्ता अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। FoPL के माध्यम से, लाल या पीले रंग के स्पष्ट संकेतों द्वारा उपभोक्ताओं को तुरंत सचेत किया जा सकता है।

ऐतिहासिक रूप से, चिली और मैक्सिको जैसे देशों ने इस तरह के लेबलिंग सिस्टम को सफलतापूर्वक लागू किया है, जिससे चीनी युक्त पेय पदार्थों की खपत में भारी कमी आई है। भारत में भी इसी तरह के मॉडल की आवश्यकता है ताकि बच्चों और युवाओं को मोटापे और अन्य बीमारियों से बचाया जा सके।

क्या आप जानते हैं?: चिली दुनिया का पहला देश था जिसने पैकेज्ड फूड पर 'हाई इन शुगर' और 'हाई इन कैलोरी' जैसे ब्लैक स्टॉप साइन लेबल अनिवार्य किए थे।
वर्तमान लेबलिंग (Back-of-Pack)प्रस्तावित लेबलिंग (FoPL)
छोटे अक्षरों में जटिल पोषण तालिकास्पष्ट, रंगीन और सरल चेतावनी संकेत
उपभोक्ताओं के लिए समझना कठिनएक नज़र में स्वास्थ्य जोखिम की पहचान
कंपनियों द्वारा मार्केटिंग का लाभपारदर्शिता और उपभोक्ता सशक्तिकरण

Frequently Asked Questions

1. FoPL क्या है?
FoPL का अर्थ है 'फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग', जिसके तहत पैकेट के सामने के हिस्से पर ही उच्च चीनी, नमक या वसा की चेतावनी दी जाती है।

2. FSSAI की इसमें क्या भूमिका है?
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) वह नियामक संस्था है जो भारत में लेबलिंग के नियमों को तय और लागू करती है।