गोवा में पिछले एक दशक में महिलाओं के बीच फेफड़ों के कैंसर के मामलों में 10% से 40% की भारी वृद्धि देखी गई है। एनजीओ 'नोट इंडिया' ने पैसिव स्मोकिंग और प्रदूषण को इसका मुख्य कारण मानते हुए सरकार से तत्काल जांच की मांग की है।
- गोवा में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में महिलाओं की हिस्सेदारी 10% से बढ़कर 40% हो गई है।
- राज्य में सालाना 120 से 150 नए लंग कैंसर के मामले दर्ज किए जा रहे हैं।
- पैसिव स्मोकिंग (दूसरों के धुएं का प्रभाव) और पर्यावरणीय प्रदूषण को संभावित कारण माना जा रहा है।
- एनजीओ 'नोट इंडिया' ने सरकार से विस्तृत महामारी विज्ञान अध्ययन (Epidemiological Study) की मांग की है।
गोवा के स्वास्थ्य परिदृश्य में एक चिंताजनक बदलाव देखा गया है। नेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर टोबैको एराडिकेशन (NOTE) इंडिया के अनुसार, राज्य में फेफड़ों के कैंसर के मरीजों में महिलाओं की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। एक दशक पहले, कुल मामलों में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 10% थी, जो अब बढ़कर लगभग 40% तक पहुंच गई है। यह बदलाव न केवल स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चौंका रहा है, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करता है।
NOTE इंडिया के अध्यक्ष डॉ. शेखर साल्कर ने इस प्रवृत्ति को एक 'महत्वपूर्ण महामारी विज्ञान बदलाव' करार दिया है। उनका तर्क है कि जबकि तंबाकू का सेवन कैंसर का प्राथमिक कारण है, लेकिन उन महिलाओं में भी मामलों की वृद्धि देखी जा रही है जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। यह संकेत देता है कि समस्या केवल व्यक्तिगत आदतों तक सीमित नहीं है, बल्कि बाहरी कारकों से जुड़ी है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that this shift reflects a broader global trend where non-smoking women are increasingly vulnerable to carcinogens. In the context of Goa, the combination of urban pollution, occupational hazards, and the prevalence of second-hand smoke in households creates a 'silent killer' effect. If not addressed, this could lead to a surge in female mortality rates linked to respiratory diseases.
"दूसरों के धुएं का प्रभाव एक अदृश्य खतरा है, लेकिन इसके परिणाम वास्तविक और घातक हैं; गैर-धूम्रपान करने वाली महिलाओं को दूसरों की लत की कीमत नहीं चुकानी चाहिए।"
लैंसेट (The Lancet) के एक अध्ययन का हवाला देते हुए एनजीओ ने बताया कि भारत में सेकंड-हैंड स्मोक से होने वाली मौतें 1990 के 2.17 लाख से बढ़कर 2023 में 3.26 लाख हो गई हैं। अनुमान है कि 2023 तक भारत में लगभग 44.4 करोड़ लोग पैसिव स्मोकिंग के संपर्क में थे। यह डेटा स्पष्ट करता है कि घर और कार्यस्थल पर धुएं का संपर्क फेफड़ों के कैंसर के साथ-साथ अस्थमा, स्ट्रोक और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाता है।
डॉ. साल्कर ने सुझाव दिया है कि राज्य सरकार को एक व्यापक अध्ययन शुरू करना चाहिए जिसमें निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान दिया जाए: पिछले दशक का डेटा, धूम्रपान की स्थिति, घरेलू ईंधन का उपयोग, और भौगोलिक वितरण। उन्होंने जोर देकर कहा कि निष्कर्षों पर जल्दबाजी में पहुंचने के बजाय, वैज्ञानिक तरीके से कारणों की जांच करना अनिवार्य है।
तुलनात्मक विश्लेषण: गोवा में लंग कैंसर (महिलाएं)
| अवधि | महिलाओं की हिस्सेदारी (%) | मुख्य संभावित कारण |
|---|---|---|
| एक दशक पहले | ~10% | मुख्यतः सक्रिय धूम्रपान |
| वर्तमान समय | ~40% | पैसिव स्मोकिंग, प्रदूषण, कार्यस्थल जोखिम |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या केवल धूम्रपान करने वाली महिलाओं को ही इसका खतरा है?
नहीं, आंकड़ों से पता चलता है कि उन महिलाओं में भी जोखिम बढ़ रहा है जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया, जिसका मुख्य कारण पैसिव स्मोकिंग और प्रदूषण है।
प्रश्न 2: पैसिव स्मोकिंग से बचाव के लिए क्या किया जा सकता है?
धूम्रपान मुक्त कानूनों का कड़ाई से पालन करना और घर व कार्यस्थल पर स्मोकिंग-फ्री जोन बनाना सबसे प्रभावी उपाय है।