भारत के पास ब्रिक्स को केवल एक गुट के बजाय 'विकल्पों के मंच' के रूप में बदलने का मौका है। विशेषज्ञ विश्लेषण बताता है कि भारत को अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाने के बजाय अपनी स्वतंत्र शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए।
- भारत को ब्रिक्स को एक राजनीतिक गुट के बजाय वैश्विक विकल्पों के केंद्र के रूप में विकसित करना चाहिए।
- अमेरिका या चीन के साथ पूर्ण संरेखण के बजाय 'रणनीतिक स्वायत्तता' भारत के लिए सबसे बेहतर मार्ग है।
- UPI जैसे डिजिटल भुगतान प्रणालियों का विस्तार और NDB शासन में सुधार भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।
भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन केवल राष्ट्राध्यक्षों का मिलन नहीं है, बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीति के एक नए युग की शुरुआत हो सकती है। इस सम्मेलन में दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी का 40 प्रतिशत हिस्सा प्रतिनिधित्व कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मेजबानी में व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति जैसे नेताओं की उपस्थिति इस आयोजन को असाधारण बनाती है।
अक्सर शिखर सम्मेलनों को केवल उनके अंतिम घोषणापत्र (Communiqué) से मापा जाता है, लेकिन ब्रिक्स की असली परीक्षा इस बात में है कि क्या भारत इस मंच पर अपने स्वयं के विचार लाता है या केवल दूसरों के एजेंडे के लिए एक मेजबान बनकर रह जाता है। कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत को ब्रिक्स को छोड़कर पूरी तरह पश्चिम की ओर देखना चाहिए, लेकिन यह दृष्टिकोण एक रणनीतिक भूल हो सकती है। पश्चिम की ओर जाना केवल 'पते का बदलाव' है, न कि कोई महान रणनीति।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण यह दर्शाता है कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में 'सम-दूरी' (Equidistance) की नीति वास्तव में शक्तिहीनता का संकेत है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह एक ऐसी व्यवस्था बनाए जहाँ चीन शक्तिशाली तो हो, लेकिन वर्चस्ववादी (Hegemonic) न हो। दुनिया को और अधिक गुटों की नहीं, बल्कि और अधिक विकल्पों की आवश्यकता है। एक ऐसा समूह जहाँ ईरान और यूएई एक साथ बैठें, उसे विचारधारा पर सहमत होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि साझा हितों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
"संप्रभुता का बचाव केवल एक देश के लिए नहीं, बल्कि यूक्रेन से लेकर गाजा तक सभी के लिए समान सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।"
भारत के पास इस सप्ताहांत तीन ठोस लक्ष्यों को प्राप्त करने का अवसर है। पहला, एक ऐसा इंटरऑपरेबिलिटी प्रोटोकॉल बनाना जो घरेलू फास्ट-पेमेंट सिस्टम (जैसे UPI) को अन्य सदस्य देशों से जोड़े, ताकि किसी एक वित्तीय प्रणाली (जैसे डॉलर) पर निर्भरता कम हो। दूसरा, न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) के शासन में सुधार करना ताकि नए सदस्यों को अधिक शक्ति मिले। तीसरा, यूक्रेन और गाजा जैसे विवादों पर सिद्धांतों आधारित रुख अपनाना।
ऐतिहासिक रूप से, कौटिल्य का 'मंडल सिद्धांत' हमें सिखाता है कि दुनिया में कई केंद्र हो सकते हैं। वर्चस्व (Hegemony) वास्तविकता नहीं है, बल्कि एक शक्तिशाली शासक की इच्छा है। भारत को अपनी भूमिका एक ऐसे केंद्र के रूप में निभानी चाहिए जो किसी एक ध्रुव के बजाय बहु-ध्रुवीय दुनिया का समर्थन करे।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या भारत को ब्रिक्स छोड़कर अमेरिका के करीब जाना चाहिए?
उत्तर: विश्लेषण के अनुसार, पूर्ण संरेखण आत्मसमर्पण के समान है। भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए ब्रिक्स को विकल्पों के मंच के रूप में उपयोग करना चाहिए।
प्रश्न 2: ब्रिक्स में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उत्तर: चीन के बढ़ते प्रभाव और वर्चस्व को संतुलित करना और समूह को एक राजनीतिक गुट के बजाय आर्थिक और तकनीकी सहयोग का माध्यम बनाना सबसे बड़ी चुनौती है।