सात साल बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के केंद्र में द्विपक्षीय संबंधों को ला दिया है। जानिए कैसे सीमा विवाद और अमेरिकी व्यापार नीतियां ग्लोबल साउथ के इस सबसे शक्तिशाली समूह को प्रभावित कर रही हैं।
- राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत की यात्रा कर रहे हैं, जो ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के साथ मेल खाती है।
- 2020 के सीमा विवाद के बाद संबंधों में आई कड़वाहट अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
- डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीतियों के कारण भारत और चीन दोनों एक ही आर्थिक दबाव का सामना कर रहे हैं।
- ब्रिक्स के भीतर चीन का बढ़ता प्रभुत्व भारत के लिए एक रणनीतिक चिंता का विषय है।
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मोड़ है, जो सात साल के अंतराल के बाद हो रही है। हालांकि इस यात्रा का आधिकारिक कारण ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में भाग लेना है, लेकिन 2020 के सीमा विवाद के बाद उपजी परिस्थितियां इस यात्रा को द्विपक्षीय दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं। यह यात्रा इस बात की परीक्षा होगी कि क्या दोनों देश अपने सीमा विवादों को अलग रखकर ग्लोबल साउथ के साझा लक्ष्यों पर काम कर सकते हैं।
2001 में अपनी स्थापना के बाद से ब्रिक्स देशों के विकास की गति अलग-अलग रही है। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है, जबकि भारत की वृद्धि दर स्थिर रही है लेकिन वह बीजिंग के पैमाने से काफी पीछे है। रूस अपने आंतरिक युद्धों और ब्राजील राजनीतिक अस्थिरता के कारण संघर्ष कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, चीन खुद को इस समूह में 'बराबरी वालों में प्रथम' (first among equals) के रूप में देखता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत और चीन के बीच का तालमेल ही ब्रिक्स की वास्तविक प्रभावशीलता तय करता है। यदि दो सबसे बड़े सदस्य आपस में विवादित रहेंगे, तो यह समूह केवल चीन के पश्चिमी-विरोधी एजेंडे का माध्यम बनकर रह जाएगा। वर्तमान भू-राजनीतिक माहौल, विशेष रूप से अमेरिकी संरक्षणवाद, दोनों देशों को करीब आने का एक सीमित अवसर प्रदान करता है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव अभी भी बरकरार है, जहाँ लगभग 50,000 भारतीय सैनिक तैनात हैं। हालांकि 2024 में सैनिकों की वापसी (disengagement) हुई और सीधी उड़ानों व वीजा प्रतिबंधों में ढील दी गई, लेकिन रणनीतिक विश्वास की भारी कमी है। चीन और पाकिस्तान का गठजोड़ भारत के लिए विश्वास बहाली में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।
आधुनिक भारत-चीन संबंधों का विरोधाभास यह है कि जहां वे सीमा पर रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, वहीं पश्चिम के आर्थिक आधिपत्य को रोकने के लिए वे सामरिक भागीदार हैं।
इस पूरी स्थिति को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों ने और जटिल बना दिया है। उनके मनमाने टैरिफ फैसलों ने चीन और भारत दोनों को आर्थिक रूप से प्रभावित किया है, जिससे दोनों देश अब अमेरिकी दबाव के खिलाफ एक ही पक्ष में खड़े नजर आते हैं। साथ ही, पश्चिम एशिया में युद्ध और बढ़ती ऊर्जा कीमतों ने ग्लोबल साउथ के देशों पर भारी आर्थिक बोझ डाला है।
| पैरामीटर | भारत की स्थिति | चीन की स्थिति |
|---|---|---|
| आर्थिक भूमिका | सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था | दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था |
| ब्रिक्स रणनीति | संतुलित और बहुध्रुवीय दृष्टिकोण | नेतृत्व और विस्तारवादी दृष्टिकोण |
| सीमा रुख | पुरानी स्थिति (status quo ante) की मांग | आक्रामक क्षेत्रीय दावे |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: सात साल बाद शी जिनपिंग की यात्रा क्यों महत्वपूर्ण है?
यह 2020 के सीमा संघर्ष के बाद संबंधों में सुधार का संकेत है और द्विपक्षीय मुद्दों को सुलझाने का एक सीधा अवसर प्रदान करती है।
प्रश्न 2: अमेरिका भारत-चीन संबंधों को कैसे प्रभावित करता है?
अमेरिकी व्यापार शुल्क और भू-राजनीतिक दबाव अक्सर भारत और चीन को अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए एक साझा मंच पर आने के लिए मजबूर करते हैं।