गुजरात उच्च न्यायालय ने सूरत के एक वरिष्ठ IPS अधिकारी के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आरोपियों को प्रताड़ित करने के आरोपों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए उनके तत्काल स्थानांतरण का मौखिक निर्देश दिया है।

मुख्य बातें

  • गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत DCP राजदीपसिंह नकूम के स्थानांतरण का निर्देश दिया।
  • वीडियो में पुलिसकर्मियों द्वारा हथकड़ी पहने आरोपियों को सड़क पर पीटने और अपमानित करने के प्रमाण मिले हैं।
  • कोर्ट ने कहा कि अधिकारी के पद पर बने रहने से जांच निष्पक्ष नहीं हो पाएगी।
  • यह मामला संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन से जुड़ा है।

गुजरात उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को सूरत में तैनात एक वरिष्ठ IPS अधिकारी को तत्काल स्थानांतरित करने का मौखिक निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को प्रताड़ित करने के आरोपों की जांच के दौरान अधिकारी का उसी शहर में बने रहना जांच की निष्पक्षता को खतरे में डाल सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सूरत के DCP राजदीपसिंह नकूम से संबंधित है, जिनके खिलाफ सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में कथित तौर पर हथकड़ी पहने आरोपियों को सार्वजनिक सड़कों पर घुमाने और लाठियों से बेरहमी से पीटने के आरोप हैं। इन वीडियो में 15 से 20 पुलिसकर्मी भी शामिल दिखाई दे रहे हैं।

न्यायालय की सख्त टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी एन राय की खंडपीठ ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लिया। अदालत ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा, "कम से कम आपको यह तो करना ही चाहिए कि आप उन्हें स्थानांतरित करें। यदि वह वहीं रहते हैं, तो अन्य पुलिस अधिकारी गवाह के रूप में बोलने से डरेंगे।"

"जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती यदि आरोपी अधिकारी अभी भी उसी पद पर तैनात है।" - कानूनी विशेषज्ञों का विश्लेषण।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला पुलिस की जवाबदेही और मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए एक मिसाल है। यदि एक वरिष्ठ IPS अधिकारी कानून की मर्यादा लांघता है, तो यह पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। यह मामला डी के बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सुरक्षा उपायों का भी उल्लंघन प्रतीत होता है।

ऐतिहासिक संदर्भ: पुलिस नियमावली

गुजरात पुलिस ने 12 मई को एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि आरोपियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना, उन्हें घुटनों के बल चलाना या लाठियों से पीटना पूरी तरह प्रतिबंधित है। यह निर्देश 2019 में पिछले हाई कोर्ट आदेशों के बाद जारी किए गए थे।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है, जिसमें पुलिस हिरासत में उत्पीड़न से सुरक्षा शामिल है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. कोर्ट ने अधिकारी को स्थानांतरित करने को क्यों कहा?

कोर्ट का मानना है कि अधिकारी के पद पर बने रहने से जांच में बाधा आएगी और गवाह (अन्य पुलिसकर्मी) सच बोलने से कतराएंगे।

2. क्या यह मामला मानवाधिकारों का उल्लंघन है?

हाँ, वकील उत्कर्ष दवे के अनुसार, यह व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का सीधा उल्लंघन है।