पटना हाई कोर्ट ने 2013 के एक मामले में कहा कि केवल सलवार हटाना और छाती दबाना, बिना दायरे में प्रवेश किए, बलात्कार की कोशिश नहीं बनता, बल्कि यह धारा 354 के तहत ‘आदरसंपन्नता’ का उल्लंघन है। अदालत ने अभियोजन की साक्ष्य कमी के कारण आरोपी को बरी कर दिया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सलवार हटाना और छाती दबाना को धारा 376 के तहत बलात्कार नहीं माना गया।
- अभियोजन ने कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया, जिससे आरोपी को बरी किया गया।
- कृत्य को धारा 354 के तहत ‘आदरसंपन्नता’ का उल्लंघन माना गया।
पटना हाई कोर्ट ने 9 जुलाई को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया, जिसमें उसने 2013 में बंका के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया। इस निर्णय में अदालत ने कहा कि अभियोजन ने यह सिद्ध नहीं किया कि आरोपी ने "बलात्कार की कोशिश" की थी, क्योंकि कोई भी ठोस साक्ष्य नहीं मिला जो इस आरोप को समर्थन दे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 19 जनवरी 2008 को अमरपुर के छाया स्टूडियो में घटित हुआ था। शिकायतकर्ता ने अपने पिता के साथ फोटो शूट के लिए स्टूडियो का दौरा किया था। आरोप में कहा गया कि स्टूडियो के मालिक हिमांशु कुमार पाठक ने शिकायतकर्ता के पिता को बाहर भेज दिया, दरवाज़ा बंद कर दिया, फिर महिला की सलवार हटाने और अपनी शारीरिक सीमा पार करने की कोशिश की। महिला ने चिल्लाकर मदद माँगी, जिसके बाद उसके पिता ने दरवाज़ा खोला और आरोपी भाग गया।
अभियोजन के साक्ष्य और अदालत की समीक्षा
अभियोजन ने पाँच गवाहों—शिकायतकर्ता, उसके माता-पिता, एक औपचारिक जांच अधिकारी और एक स्वतंत्र गवाह—को पेश किया। हालांकि, जांच अधिकारी को परीक्षण में बुलाया नहीं गया और कोई चिकित्सकीय रिपोर्ट नहीं प्रस्तुत की गई। हाई कोर्ट ने यह ध्यान दिया कि किसी भी प्रकार की जननांग में प्रवेश या स्पष्ट बलात्कार की कोशिश के संकेत नहीं मिले।
कानूनी विश्लेषण
अदालत ने कहा कि धारा 376/511 के तहत "बलात्कार की कोशिश" सिद्ध करने के लिए प्रवेश या उसके निकटतम संकेत आवश्यक हैं, जो इस मामले में नहीं दिखे। इसके बजाय, आरोपी द्वारा महिला की सलवार हटाना और छाती दबाना, धारा 354 के तहत "आदरसंपन्नता" का उल्लंघन माना गया, जिससे केवल "आक्रमण" या "आपराधिक बल" की सजा लागू हो सकती है।
निर्णय के परिणाम
उच्च न्यायालय ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया और पाठक को बरी कर दिया। इस फैसले ने भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में "बलात्कार की कोशिश" की परिभाषा को स्पष्ट किया, जिससे भविष्य में समान मामलों में साक्ष्य की महत्ता पर ज़ोर दिया जाएगा।