सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (संरक्षण और अधिकारों) संशोधन अधिनियम, 2026 के लागू होने के बाद भी पुराने पहचान पत्र वैध रहेंगे। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह आश्वासन दिया।
- 2026 के संशोधन अधिनियम से पहले जारी ट्रांसजेंडर आईडी कार्ड पूरी तरह वैध रहेंगे।
- सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नया कानून पहले से दिए गए अधिकारों को नहीं छीन सकता।
- याचिकाकर्ताओं ने 2026 के कानून को 'स्व-पहचान' के अधिकार का उल्लंघन बताया है।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय में सोमवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय को बड़ी राहत दी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तीन न्यायाधीशों की पीठ, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत कर रहे थे, को आश्वासन दिया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (संरक्षण और अधिकारों) संशोधन अधिनियम, 2026 के अधिनियमन से पहले जारी किए गए पहचान पत्र अपनी वैधता बनाए रखेंगे।
यह मामला तब गरमाया जब याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि 2026 का नया कानून ट्रांसजेंडर समुदाय के 'स्व-पहचान' (Self-identification) के मौलिक अधिकार को कमजोर करता है। ट्रांसजेंडर पहचान पत्र केवल एक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की लैंगिक पहचान की आधिकारिक मान्यता है, जिसका उपयोग सरकारी रिकॉर्ड में नाम और लिंग परिवर्तन के लिए किया जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और कानूनी संघर्ष
इस विवाद की जड़ें 2014 के ऐतिहासिक NALSA निर्णय में हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को मान्यता दी थी। इसी निर्णय के परिणामस्वरूप 2019 का अधिनियम आया था, जिसने काफी हद तक स्व-पहचान के सिद्धांत को अपनाया था। हालांकि, 2026 के संशोधन अधिनियम (जो 30 मार्च से प्रभावी हुआ) पर आरोप है कि इसने राज्य को लैंगिक पहचान निर्धारित करने का अत्यधिक अधिकार दे दिया है।
"कानून का उद्देश्य हाशिए पर रहने वाले समुदायों को सशक्त बनाना होना चाहिए, न कि उनकी पहचान को प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन करना।"
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह कानूनी लड़ाई केवल पहचान पत्रों के बारे में नहीं है, बल्कि यह इस बात पर केंद्रित है कि क्या राज्य किसी व्यक्ति की आंतरिक पहचान को परिभाषित कर सकता है। यदि 2026 का कानून पूर्वव्यापी (retrospective) रूप से लागू होता, तो हजारों ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की कानूनी पहचान संकट में पड़ जाती, जिससे उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर प्रभावित होते।
| विशेषता | 2019 अधिनियम / NALSA | 2026 संशोधन अधिनियम (विवादास्पद बिंदु) |
|---|---|---|
| पहचान का आधार | स्व-पहचान (Self-Identification) | राज्य द्वारा निर्धारित पहचान की संभावना |
| अधिकारों की प्रकृति | मौलिक अधिकार आधारित | प्रशासनिक नियंत्रण आधारित |
याचिकाकर्ताओं, जिनमें कई कार्यकर्ता और समुदाय के सदस्य शामिल हैं, का तर्क है कि 2026 अधिनियम की धारा 3 ने "विधायी कलम के एक स्ट्रोक" से स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान के अधिकार को समाप्त कर दिया है। एक समुदाय की सदस्य वकील ने अदालत में भावुक अपील करते हुए कहा कि यह कार्ड उनकी बुनियादी पहचान का अभिन्न अंग है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या 2026 का कानून पुराने आईडी कार्ड्स को रद्द करता है?
नहीं, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आश्वासन दिया है कि पुराने कार्ड वैध रहेंगे।
प्रश्न 2: NALSA निर्णय का महत्व क्या था?
इस निर्णय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं चुनने का कानूनी अधिकार दिया था।