दिल्ली पुलिस द्वारा हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान फेशियल रिकग्निशन सिस्टम, एआई-सक्षम कैमरों और स्मार्ट चश्मों के इस्तेमाल ने देश में नई बहस छेड़ दी है। भारत में इस तकनीक के नियमन के लिए कोई विशिष्ट कानून न होने से गोपनीयता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
- दिल्ली पुलिस ने हालिया प्रदर्शनों के दौरान फेशियल रिकग्निशन तकनीक (FRS), AI कैमरों और स्मार्ट चश्मों का इस्तेमाल किया है।
- भारत में वर्तमान में फेशियल रिकग्निशन तकनीकों के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं है।
- गोपनीयता कार्यकर्ताओं का मानना है कि अनियंत्रित बायोमेट्रिक निगरानी से नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर बुरा असर पड़ सकता है।
हाल ही में दिल्ली पुलिस द्वारा आयोजित सुरक्षा व्यवस्था के दौरान फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS), एआई-सक्षम कैमरों, स्मार्ट चश्मों और ड्रोनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इस तकनीक का उपयोग मुख्य रूप से कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों की पहचान करने और उन पर नजर रखने के लिए किया गया था। इस कदम ने देश के कानूनी और नागरिक समाज हलकों में एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है, क्योंकि भारत में इस तरह की उन्नत बायोमेट्रिक निगरानी प्रणालियों के उपयोग को विनियमित करने के लिए कोई विशिष्ट कानून मौजूद नहीं है।
विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि बिना किसी कानूनी ढांचे के इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल नागरिकों की निजता के अधिकार का सीधे तौर पर उल्लंघन करता है। जब कानून प्रवर्तन एजेंसियां बिना किसी न्यायिक वारंट या स्पष्ट दिशा-निर्देशों के सार्वजनिक स्थानों पर बड़े पैमाने पर लोगों के चेहरे का डेटा एकत्र करती हैं, तो यह सामूहिक निगरानी की श्रेणी में आता है। यह अभ्यास नागरिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करने से हतोत्साहित कर सकता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और कानूनी शून्यता
भारत में निगरानी और पुलिसिंग का इतिहास मुख्य रूप से औपनिवेशिक काल के कानूनों, जैसे कि पुलिस अधिनियम, 1861 पर आधारित रहा है। हालांकि, डिजिटल युग में तकनीक के तेजी से विकास के साथ, कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने आधुनिक उपकरणों को अपना लिया है, लेकिन कानूनी ढांचा उसी गति से विकसित नहीं हो पाया है। वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में निजता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार घोषित किया गया था। इसके बावजूद, फेशियल रिकग्निशन जैसी संवेदनशील तकनीकों के लिए एक समर्पित कानून का न होना चिंता का विषय बना हुआ है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि बिना किसी मजबूत डेटा सुरक्षा कानून या नियामक संस्था के सार्वजनिक निगरानी उपकरणों का अनियंत्रित उपयोग एक खतरनाक मिसाल कायम करता है। यह न केवल असहमति की आवाज को दबाने का काम कर सकता है, बल्कि तकनीकी त्रुटियों के कारण निर्दोष नागरिकों को गलत तरीके से फंसाए जाने का जोखिम भी बढ़ाता है।
"बिना किसी ठोस कानूनी नियमन के बायोमेट्रिक निगरानी देश के नागरिकों को संदेह के दायरे में खड़ा करती है, जो हमारे लोकतांत्रिक ढांचे और असहमति के अधिकार के लिए एक बड़ा खतरा है।"
वैश्विक स्तर पर, फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल को लेकर कड़े नियम बनाए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ (EU) ने अपने हालिया एआई अधिनियम के तहत सार्वजनिक स्थानों पर वास्तविक समय (रियल-टाइम) बायोमेट्रिक पहचान के उपयोग पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इसके विपरीत, भारत में इस तकनीक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, जिससे नागरिकों के डेटा के दुरुपयोग और लीक होने का खतरा बढ़ गया है।
| मापदंड | पारंपरिक पुलिसिंग | एआई-सक्षम बायोमेट्रिक पुलिसिंग |
|---|---|---|
| डेटा संग्रह | मैनुअल पहचान और भौतिक रिकॉर्ड | स्वचालित बायोमेट्रिक और रीयल-टाइम स्कैनिंग |
| कानूनी ढांचा | स्थापित आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) | कोई विशिष्ट समर्पित कानून नहीं |
| निजता पर प्रभाव | सीमित और लक्षित | व्यापक और सामूहिक निगरानी |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: भारत में फेशियल रिकग्निशन तकनीक (FRS) के उपयोग को कौन सा कानून नियंत्रित करता है?
उत्तर: वर्तमान में भारत में फेशियल रिकग्निशन तकनीक के उपयोग को विनियमित करने के लिए कोई विशिष्ट या समर्पित कानून नहीं है, जिससे इसके दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है।
प्रश्न 2: फेशियल रिकग्निशन तकनीक से मौलिक अधिकारों को क्या खतरा है?
उत्तर: यह तकनीक संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत निजता के अधिकार और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और विरोध करने के अधिकार (अनुच्छेद 19) को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।