जम्मू की एक विशेष एनआईए (NIA) अदालत ने 2019 के भीषण पुलवामा आत्मघाती हमले की सह-आरोपी इंशा जान की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने माना कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं, जिसके कारण यूएपीए (UAPA) के तहत राहत नहीं दी जा सकती।
- विशेष एनआईए अदालत ने पुलवामा हमले की आरोपी इंशा जान की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है।
- अदालत ने यूएपीए (UAPA) की धारा 43-डी(5) के तहत वैधानिक प्रतिबंध को जमानत न देने का मुख्य आधार बनाया।
- बचाव पक्ष ने लंबे समय से हिरासत और स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला दिया था, जिसे कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने अमान्य माना।
जम्मू की एक विशेष एनआईए (National Investigation Agency) अदालत ने साल 2019 में हुए भीषण पुलवामा आत्मघाती हमले की आरोपी इंशा जान उर्फ इंशा तारिक की जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के 40 जवान शहीद हो गए थे। विशेष न्यायाधीश प्रेम सागर ने अपने 15 पन्नों के विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया पूरी तरह सच प्रतीत होते हैं।
दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के हाकीपोरा गांव की निवासी इंशा जान को 3 मार्च 2020 को उसके पिता पीर तारिक अहमद शाह के साथ गिरफ्तार किया गया था। वह वर्तमान में रणबीर दंड संहिता (RPC), गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), आर्म्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत गंभीर आरोपों में मुकदमे का सामना कर रही हैं। अदालत ने 10 दिसंबर 2022 को उनके खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय किए थे।
एनआईए की चार्जशीट के मुताबिक, इंशा जान कथित तौर पर इस बड़ी आतंकी साजिश में सक्रिय रूप से शामिल थीं। वह लगातार पाकिस्तानी आतंकवादी मुहम्मद उमर फारूक के संपर्क में थीं। फारूक और एक अन्य पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद कामरान अली को बाद में सुरक्षा बलों ने अलग-अलग मुठभेड़ों में ढेर कर दिया था। इंशा पर इन आतंकवादियों को अपने घर में पनाह देने, भोजन और अन्य रसद सहायता (Logistical Support) प्रदान करने का आरोप है।
अदालत में बहस: बचाव पक्ष बनाम एनआईए की दलीलें
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने मुख्य रूप से इंशा की छह साल से अधिक की लंबी हिरासत, मुकदमे की धीमी गति और उनके स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि कुल 240 गवाहों में से अब तक केवल 49 गवाहों की ही जांच हो सकी है, जिससे यह मुकदमा कई और वर्षों तक खिंच सकता है। इसके अलावा, उन्होंने दावा किया कि इंशा गंभीर त्वचा रोग, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइतित और पुराने सिरदर्द से पीड़ित हैं, जिसके लिए उन्हें विशेष चिकित्सा उपचार की आवश्यकता है।
दूसरी ओर, एनआईए ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। जांच एजेंसी ने अदालत को बताया कि आरोपी एक अत्यधिक प्रेरित आतंकी सहयोगी है जिसने बेहद योजनाबद्ध तरीके से इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया। एनआईए ने सबूत के तौर पर इंशा और मृत आतंकवादी फारूक के बीच व्हाट्सएप कॉल, वॉयस नोट्स और उसके मोबाइल फोन से बरामद की गई तस्वीरों को पेश किया। इसके अलावा, 14 फरवरी 2019 के हमले के बाद वायरल हुआ आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार का वीडियो भी कथित तौर पर इंशा के ही घर में रिकॉर्ड किया गया था।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows... पुलवामा जैसे देश को दहला देने वाले संवेदनशील आतंकी मामलों में जमानत याचिका का खारिज होना भारत की न्यायपालिका के कड़े और जीरो-टॉलरेंस रुख को दर्शाता है। यूएपीए की धारा 43-डी(5) का कड़ाई से अनुपालन यह सुनिश्चित करता है कि जब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा हो, तो प्रक्रियात्मक देरी या मानवीय आधारों पर दी जाने वाली ढील को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। यह फैसला आतंकवाद के खिलाफ भारत की कानूनी लड़ाई को और मजबूत करता है।
"आतंकवाद से जुड़े मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा और पीड़ितों के प्रति न्याय सर्वोपरि है। यूएपीए के कड़े प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के खिलाफ साजिश रचने वालों को कोई कानूनी ढील न मिले।"
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: पुलवामा हमला और कानूनी स्थिति
14 फरवरी 2019 को जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सीआरपीएफ के काफिले पर एक आत्मघाती हमला हुआ था। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था और इसके बाद भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव चरम पर पहुंच गया था। इस मामले की जांच एनआईए को सौंपी गई थी, जिसने आतंकी नेटवर्क के खिलाफ ठोस डिजिटल और भौतिक सबूत जुटाए हैं।
| पैरामीटर | बचाव पक्ष के दावे | एनआईए के निष्कर्ष |
|---|---|---|
| साजिश में भूमिका | कोई सीधा संबंध नहीं, झूठा फंसाया गया | आतंकियों को शरण, भोजन और रसद प्रदान की। |
| डिजिटल सबूत | कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं | व्हाट्सएप कॉल, वॉयस नोट्स और तस्वीरें बरामद। |
| हिरासत और स्वास्थ्य | 6 साल से जेल में, बीमारी का हवाला | गंभीर अपराध, दिमागी परिपक्वता और सक्रिय भागीदारी। |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: इंशा जान की जमानत याचिका क्यों खारिज की गई?
उत्तर: अदालत ने पाया कि इंशा जान के खिलाफ पुलवामा हमले की साजिश में शामिल होने के पर्याप्त प्रथम दृष्टया सबूत हैं, इसलिए यूएपीए की धारा 43-डी(5) के तहत जमानत खारिज कर दी गई।
प्रश्न 2: यूएपीए की धारा 43-डी(5) क्या है?
उत्तर: इस धारा के तहत, यदि अदालत को केस डायरी या चार्जशीट के आधार पर लगता है कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं, तो आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती।