बिहार सरकार ने बांग्लादेश के साथ 1996 की गंगा जल साझाकरण संधि (फरक्का संधि) के नवीनीकरण का विरोध किया है। राज्य का दावा है कि इस संधि के कारण बिहार को भीषण बाढ़ और गाद (siltation) की समस्या झेलनी पड़ रही है।
- बिहार सरकार ने 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल साझाकरण संधि को समाप्त करने की मांग की है।
- मुख्य चिंताएं: भीषण गाद जमा होना, भागलपुर जैसे जिलों में बाढ़ और गर्मियों में पानी की कमी।
- दिसंबर 2026 में संधि समाप्त हो रही है, जिससे केंद्र सरकार के लिए कूटनीतिक संकट पैदा हो गया है।
बिहार में 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल साझाकरण संधि, जिसे आम तौर पर फरक्का संधि कहा जाता है, को लेकर एक नया राजनीतिक और कूटनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। जैसे-जैसे इस संधि की अवधि समाप्त होने वाली है, बिहार की सत्तारूढ़ एनडीए (NDA) सरकार इसके नवीनीकरण का कड़ा विरोध कर रही है। यह स्थिति भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी दुविधा बन गई है।
बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी, जो जल संसाधन विभाग संभाल रहे हैं, ने स्पष्ट किया कि राज्य ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक में अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। उन्होंने कहा कि यह संधि बिहार के हितों के लिए हानिकारक साबित हुई है। जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने भी केंद्र से इस समझौते को आगे न बढ़ाने का आग्रह किया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल पानी के बंटवारे का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय अस्तित्व बनाम अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का है। केंद्र सरकार को एक तरफ बांग्लादेश के साथ अपने 'नेबरहुड फर्स्ट' (पड़ोसी पहले) नीति को बनाए रखना है और दूसरी तरफ अपने गठबंधन सहयोगी जेडीयू की मांगों को सुनना है। यदि बिहार की मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो यह एनडीए के भीतर राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकता है।
संजय कुमार झा का तर्क है कि पिछले 30 वर्षों में इस संधि की समीक्षा नहीं की गई। उन्होंने कहा कि बिहार अब औद्योगिकीकरण के दौर में है और 2050 तक की उसकी पानी की जरूरतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। संधि में "न्यूनतम प्रवाह गारंटी क्लॉज" की कमी के कारण बिहार को गर्मियों में पानी की किल्लत का सामना करना पड़ता है, जबकि संधि के तहत पानी बांग्लादेश को देना पड़ता है।
फरक्का बैराज ने इस क्षेत्र की जल विज्ञान प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है, जिससे बिहार के कृषि प्रधान इलाकों में मौसमी आपदाएं आम हो गई हैं।
ऐतिहासिक रूप से, 1975 में फरक्का बैराज का निर्माण कोलकाता पोर्ट को चालू रखने के लिए गंगा के पानी को हुगली नदी में मोड़ने के लिए किया गया था। लेकिन बिहार का आरोप है कि इस बैराज के कारण नदी के तल में भारी मात्रा में गाद (silt) जमा हो गई है, जिससे नदी की जल धारण क्षमता कम हो गई है। परिणामस्वरूप, मानसून के दौरान भागलपुर और मुंगेर जैसे जिलों में भीषण बाढ़ आती है।
| विशेषता | 1977 का अस्थायी समझौता | 1996 की गंगा संधि |
|---|---|---|
| अवधि | अल्पकालिक/अस्थायी | 30 वर्षीय बाध्यकारी (1996-2026) |
| प्रवाह गारंटी | बुनियादी दिशा-निर्देश | न्यूनतम प्रवाह गारंटी क्लॉज का अभाव |
| मुख्य लक्ष्य | तत्काल जल साझाकरण | निश्चित वितरण ढांचा |
इस मुद्दे पर राजनीतिक खींचतान भी तेज है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने 2011 में संसद में इस बैराज को हटाने की मांग की थी। हालांकि, जेडीयू ने इसे राजनीति बताया है और सवाल उठाया है कि 1996 में जब आरजेडी सरकार का समर्थन कर रही थी, तब उन्होंने इस संधि का विरोध क्यों नहीं किया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: फरक्का जल संधि कब समाप्त हो रही है?
यह संधि अपनी 30 साल की अवधि पूरी कर दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है।
प्रश्न 2: बिहार इस बैराज को क्यों हटाना चाहता है?
बिहार का तर्क है कि बैराज के कारण नदी के तल में गाद जमा हो गई है, जिससे नदी का स्तर ऊपर उठ गया है और मानसून में भीषण बाढ़ आती है।