एक साक्षात्कार में प्रीति अडानी ने कहा कि भारत की सामाजिक कार्य में पैसा नहीं, बल्कि क्षमता की कमी है। उन्होंने दानकर्ताओं से संस्थागत सशक्तिकरण पर ध्यान देने का आग्रह किया।
- भारत के पास सामाजिक पहल के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन हैं।
- स्थायी परिवर्तन के लिए संस्थागत क्षमता निर्माण अनिवार्य है।
- दानकर्ताओं को अल्पकालिक कार्यक्रमों से अधिक सशक्तिकरण पर ध्यान देना चाहिए।
प्रीति अडानी ने हालिया साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि भारत में सामाजिक कार्यों के लिए धन की कमी नहीं, बल्कि क्षमता की कमी है। उनका मानना है कि दान‑कार्य को केवल कार्यक्रम चलाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए; उसे संस्थाओं को सशक्त बनाने की दिशा में जाना चाहिए।
अडानी का तर्क
अडानी ने कहा, "स्वतंत्रता महिलाओं के लिए केवल विचार नहीं, बल्कि विकल्प, अवसर और उन्नति की आज़ादी है।" इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि यदि संस्थाएँ अपने भीतर उचित संरचना और कौशल विकसित नहीं करतीं, तो कोई भी वित्तीय निवेश दीर्घकालिक प्रभाव नहीं छोड़ पाएगा।
भारतीय परोपकार का इतिहास
पिछले दो दशकों में भारत में परोपकार की संस्कृति में उल्लेखनीय बदलाव आया है। बड़े उद्योग समूहों और परिवारों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में अरबों रुपये निवेश किए हैं। हालांकि, कई पहलें सतही रह गई हैं क्योंकि उन्हें समर्थन देने वाली संस्थागत नींव कमजोर रही।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that a shift from project‑centric grants to capacity‑building frameworks could unlock exponential social returns, especially in rural and marginalized communities where institutional gaps are widest.
"क्षमता निर्माण सतत विकास की नींव है," कहते हैं डॉ. मीरा शर्मा, भारतीय विकास संस्थान की वरिष्ठ सहयोगी।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: दान में क्षमता निर्माण का मतलब क्या है?
उत्तर: यह संस्थाओं को प्रबंधन, तकनीकी कौशल और वित्तीय स्थिरता प्रदान करने की प्रक्रिया है, जिससे वे स्वयं सतत कार्य कर सकें।
प्रश्न 2: क्या यह दृष्टिकोण सभी दान संस्थाओं के लिए लागू है?
उत्तर: अधिकांश बड़े दानकर्ता इस मॉडल को अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, क्योंकि यह दीर्घकालिक प्रभाव को अधिकतम करता है।