छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा है कि यदि विवाहित बेटियां निर्भरता की शर्तों को पूरा करती हैं, तो उन्हें अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

  • विवाह महिलाओं के लिए अनुकंपा नियुक्ति में अयोग्यता नहीं माना जा सकता।
  • पात्रता का निर्धारण 'वैवाहिक स्थिति' के बजाय 'निर्भरता' के आधार पर होना चाहिए।
  • बेटों को लाभ देकर बेटियों को वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है।
  • छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक को 90 दिनों के भीतर नियुक्ति करने का आदेश।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने रोजगार के अवसरों में लैंगिक समानता को मजबूत करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक को निर्देश दिया है कि वह मृत कर्मचारियों की दो विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति दे, क्योंकि बैंक की योजना में विवाह को अयोग्यता के रूप में नहीं दर्शाया गया है।

यह मामला शीना डेविड और अंकिता मिश्रा द्वारा दायर किया गया था, जिनके पिता बैंक में क्रमशः शाखा प्रबंधक और कार्यालय सहायक के रूप में कार्यरत थे। सिंगल बेंच ने उनके विवाहित होने के आधार पर उनकी दावों को खारिज कर दिया था। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने इस आदेश को पलटते हुए इसे मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय भारतीय प्रशासनिक कानून में व्याप्त उस पितृसत्तात्मक सोच पर प्रहार करता है, जिसमें माना जाता है कि बेटी की निर्भरता शादी के बाद खत्म हो जाती है, जबकि बेटे की नहीं। अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि 'निर्भरता' एक तथ्यात्मक स्थिति है, न कि कोई सामाजिक धारणा।

"अनुकंपा नियुक्ति के लिए पैमाना वास्तविक निर्भरता होना चाहिए, न कि वैवाहिक स्थिति; लिंग के आधार पर कोई भी भेदभाव मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।"

सुनवाई के दौरान बैंक के वकील ने तर्क दिया कि विवाहित बेटा आमतौर पर परिवार का भरण-पोषण करता है, जबकि विवाहित बेटी अपने ससुराल का हिस्सा बन जाती है। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी सामाजिक धारणाएं संवैधानिक जांच के सामने नहीं टिक सकतीं। कोर्ट ने पाया कि बैंक ने पहले कई विवाहित बेटों को अनुकंपा नियुक्ति दी थी, जो बेटियों के साथ भेदभाव को साबित करता है।

अदालत ने उल्लेख किया कि बैंक की योजना में 'पूर्णतः आश्रित पुत्र' और 'पूर्णतः आश्रित पुत्री' शब्द का प्रयोग किया गया है, लेकिन बेटियों के लिए विवाहित या अविवाहित होने की कोई शर्त नहीं रखी गई है। इसलिए, केवल निर्भरता ही एकमात्र निर्णायक मानदंड होनी चाहिए।

ऐतिहासिक रूप से, 2015 और 2016 में जब कर्मचारियों की मृत्यु हुई, तब बैंक के पास कोई स्पष्ट नीति नहीं थी। बाद में 2019 में लागू की गई नीति को 11 फरवरी 2014 के बाद मृत कर्मचारियों के लिए पूर्वव्यापी (retrospective) रूप से लागू किया गया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता इस योजना के तहत लाभ पाने की हकदार हैं।

मानदंड बैंक की पिछली धारणा उच्च न्यायालय का निर्णय
विवाहित पुत्र पात्र (आश्रित माना गया) पात्र (वास्तविक निर्भरता के आधार पर)
विवाहित पुत्री अपात्र (स्वतंत्र माना गया) पात्र (वास्तविक निर्भरता के आधार पर)
कानूनी आधार सामाजिक परंपरा संविधान के अनुच्छेद 14 और 15
क्या आप जानते हैं?: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: अनुकंपा नियुक्ति क्या होती है?
यह सेवा के दौरान मृत कर्मचारी के आश्रित परिवार के सदस्य को दी जाने वाली नौकरी है, ताकि परिवार को तत्काल वित्तीय सहायता मिल सके।

प्रश्न 2: क्या यह फैसला सभी सरकारी नौकरियों पर लागू होता है?
यद्यपि यह आदेश छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक के लिए है, लेकिन यह अन्य संस्थानों के लिए भी एक कानूनी मिसाल कायम करता है कि निर्भरता के दावों में लैंगिक समानता होनी चाहिए।