जस्टिस उज्जवल भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 124(3) पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जो सुप्रीम कोर्ट में 'प्रतिष्ठित न्यायविदों' की नियुक्ति की अनुमति देता है—एक ऐसा प्रावधान जो 76 वर्षों से अप्रयुक्त है।
- अनुच्छेद 124(3) सुप्रीम कोर्ट के लिए तीन रास्ते देता है: HC जज (5+ वर्ष), अधिवक्ता (10+ वर्ष), या 'प्रतिष्ठित न्यायविद'।
- संवैधानिक अधिदेश के बावजूद, अब तक किसी भी कानूनी शिक्षाविद को इस श्रेणी के तहत नियुक्त नहीं किया गया है।
- यह प्रावधान अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हार्वर्ड प्रोफेसर फेलिक्स फ्रैंकफर्टर की नियुक्ति से प्रेरित था।
भारतीय न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया लंबे समय से एक तय ढर्रे पर चल रही है: या तो हाई कोर्ट के जजों की पदोन्नति या फिर बार से सीधे नियुक्तियां। हालांकि, जस्टिस उज्जवल भुइयां की एक हालिया टिप्पणी ने एक सुप्त संवैधानिक प्रावधान को फिर से चर्चा में ला दिया है। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के 13वें दीक्षांत समारोह में जस्टिस भुइयां ने सवाल उठाया कि "प्रतिष्ठित न्यायविद" (distinguished jurist) की नियुक्ति का प्रावधान 76 से अधिक वर्षों से अप्रयुक्त क्यों है।
अनुच्छेद 124(3) का विश्लेषण
भारत का संविधान, अनुच्छेद 124(3) के तहत, सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में नियुक्ति के लिए तीन अलग-अलग पात्रता मानदंड प्रदान करता है। पहला, व्यक्ति कम से कम पांच वर्षों तक हाई कोर्ट के जज के रूप में कार्य कर चुका हो; दूसरा, उसने कम से कम दस वर्षों तक हाई कोर्ट के अधिवक्ता के रूप में अभ्यास किया हो; या तीसरा, राष्ट्रपति की राय में वह एक "प्रतिष्ठित न्यायविद" हो। महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान यह परिभाषित नहीं करता कि "प्रतिष्ठित न्यायविद" कौन है, जिससे नियुक्ति प्राधिकारी को व्यापक विवेकाधीन शक्ति मिलती है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि 'जज-से-जज' पदोन्नति मॉडल पर अत्यधिक निर्भरता एक न्यायिक एकरूपता (monoculture) पैदा करती है। 'प्रतिष्ठित न्यायविद' खंड की अनदेखी करके, भारतीय न्यायपालिका उन गहरे सैद्धांतिक अंतर्दृष्टि और शैक्षणिक कठोरता को खो रही है जो कानूनी विद्वान ला सकते हैं। संविधान निर्माताओं का मूल उद्देश्य पेशेवर पृष्ठभूमि में विविधता लाना था, ताकि बेंच केवल प्रैक्टिस करने वाले वकीलों और जजों तक सीमित न रहे।
इस प्रावधान का ऐतिहासिक संदर्भ 1949 की संविधान सभा की बहसों में मिलता है। एच.वी. कामथ जैसे सदस्यों ने तर्क दिया था कि कानूनी ज्ञान केवल अदालतों तक सीमित नहीं है। उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका का उदाहरण दिया, जहाँ राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने 1939 में हार्वर्ड लॉ स्कूल के प्रोफेसर फेलिक्स फ्रैंकफर्टर को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था। फ्रैंकफर्टर 'न्यायिक संयम' (judicial restraint) के सिद्धांत के प्रबल समर्थक बने।
76 वर्षों तक एक प्रतिष्ठित न्यायविद की नियुक्ति न होना उच्च न्यायपालिका में बौद्धिक विविधता के बजाय प्रक्रियात्मक परिचय के प्रति प्रणालीगत प्राथमिकता को दर्शाता है।
दिलचस्प बात यह है कि हाई कोर्ट में इस 'न्यायविद' मार्ग को विस्तारित करने का प्रयास अल्पकालिक रहा। हालांकि 1976 के 42वें संशोधन ने हाई कोर्ट के जज के रूप में प्रतिष्ठित न्यायविदों की नियुक्ति की अनुमति दी थी, लेकिन इसे 1978 के 44वें संशोधन द्वारा तेजी से निरस्त कर दिया गया। परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट एकमात्र ऐसा मंच है जहाँ ऐसी नियुक्ति संवैधानिक रूप से संभव है, लेकिन व्यावहारिक रूप से शून्य है।
शैक्षणिक नियुक्ति में बाधाएं
शिक्षाविदों की नियुक्ति के खिलाफ प्राथमिक तर्क 'कोर्टरूम अनुभव' की कमी है। आलोचकों का तर्क है कि न्यायिक प्रशासन, साक्ष्य कानून और प्रक्रियात्मक बारीकियों को कक्षा में नहीं, बल्कि बेंच या बार पर सीखा जाता है। इसके अलावा, पूर्णकालिक कानून शिक्षकों के लिए अधिवक्ता के रूप में अभ्यास करने पर प्रतिबंध है, जिससे वे मुकदमेबाजी के व्यावहारिक अनुभव से वंचित रह जाते हैं।
| मार्ग | आवश्यकता | उपयोग की आवृत्ति |
|---|---|---|
| हाई कोर्ट जज | 5 वर्ष का अनुभव | बहुत अधिक |
| अधिवक्ता | 10 वर्ष का अनुभव | कम (11 मामले) |
| प्रतिष्ठित न्यायविद | राष्ट्रपति की राय | शून्य (कभी नहीं) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. कौन तय करता है कि कौन 'प्रतिष्ठित न्यायविद' है?
अनुच्छेद 124(3) के अनुसार, यह निर्णय भारत के राष्ट्रपति का होता है, हालांकि वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली में सिफारिश न्यायपालिका से आती है।
2. क्या आज एक कानून प्रोफेसर को हाई कोर्ट का जज नियुक्त किया जा सकता है?
नहीं। हालांकि 1977 और 1979 के बीच यह संभव था, लेकिन 44वें संशोधन ने हाई कोर्ट में प्रतिष्ठित न्यायविदों के प्रावधान को हटा दिया।