गोवा के दिवर द्वीप पर श्री सप्तकोटेश्वर मंदिर की पुनर्स्थापना के दौरान 14वीं से 16वीं सदी के कई पुरातात्विक अवशेष मिले हैं। इन खोजों में पारंपरिक ‘किर्तिमुख’ मोटिफ और स्तम्भ का नक्काशीदार शीर्ष शामिल है, जो मंदिर के कई बार पुनर्निर्माण को दर्शाता है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने इन खोजों को राज्य की सांस्कृतिक विरासत के महत्व को सुदृढ़ करने वाला बताया।

  • 14‑16वीं सदी के अवशेषों की खोज से मंदिर के इतिहास का नया अध्याय खुला।
  • ‘किर्तिमुख’ मोटिफ और नक्काशीदार स्तम्भ शीर्ष जैसे विशिष्ट कलाकृतियां मिलीं।
  • विजयनगर और कादंबा काल के पुनर्निर्माण के संकेत मिले।

गोवा के दिवर द्वीप पर श्री सप्तकोटेश्वर मंदिर के पुरानी साइट पर चल रहे पुनर्स्थापना कार्य के दौरान 14वीं से 16वीं सदी के कई पुरातात्विक अवशेष उजागर हुए। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने इन खोजों को राज्य की ऐतिहासिक क्रमबद्धता और पवित्र विरासत को सुदृढ़ करने वाला बताया।

खोजे गए प्रमुख अवशेषों में ‘किर्तिमुख’ मोटिफ शामिल है, जो पारंपरिक रूप से मंदिर के द्वार के ऊपर उकेरा जाता है, तथा एक नक्काशीदार स्तम्भ का शीर्ष (कॅपिटल) मिला। इसके अलावा, देव खोताम के हिस्से भी मिले, जो मूर्तियों को स्थापित करने के लिए उपयोग होते थे।

ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार, सप्तकोटेश्वर मंदिर का मूल निर्माण कादंबा राजवंश (10वीं‑14वीं सदी) के समय हुआ था। बाद में बहामनी शासन में इसे नष्ट कर दिया गया और 1391 में विजयनगर साम्राज्य के एक मंत्री ने इसे पुनर्निर्मित किया। पुर्तगाली उपनिवेशकाल में 16वीं सदी में मंदिर को फिर से ध्वस्त किया गया, जिससे इसकी मूर्ति बिचोलिम तक स्थानांतरित हो गई।

सरकार ने “कोटितीर्थ कॉरिडोर विकास परियोजना” के तहत इस स्थल को तीर्थस्थल के रूप में पुनर्स्थापित करने की योजना बनाई है। इस कार्यक्रम के तहत ‘उडाक्षांति और गंगा पूजा’ का आयोजन भी किया गया, जिससे पुर्तगाली काल में नष्ट हुए लगभग 1,000 मंदिरों की स्मृति को सहेजा जा सके।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that these layered archaeological layers not only confirm the temple’s continuous religious significance but also provide tangible proof of Goa’s syncretic cultural evolution—from Kadamba to Vijayanagar to Portuguese influences.

“The stratified artifacts illustrate a resilient spiritual landscape that survived successive conquests and reconstructions.”

विशेषज्ञों का मानना है कि इन खोजों से गोवा के प्राचीन इतिहास की समयरेखा स्पष्ट होगी और भविष्य में अन्य खोए हुए मंदिरों की पुनःस्थापना में मार्गदर्शन मिलेगा।

Did You Know?: सप्तकोटेश्वर मंदिर के मूल जलाशय ‘कोटि-तीर्थ’ को आज भी स्थानीय लोग पवित्र स्नान स्थल मानते हैं।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या इन अवशेषों से मंदिर के मूल वास्तुशिल्प शैली का पता चलता है?

उत्तर: हाँ, किर्तिमुख और नक्काशीदार कॅपिटल जैसी कलाकृतियां विजयनगर शैली की पुष्टि करती हैं, जबकि कादंबा काल की पत्थर की बनावट भी मिली है।

प्रश्न 2: सरकार इन खोजों को कैसे संरक्षित करने की योजना बना रही है?

उत्तर: राज्य ने एक उच्चस्तरीय समिति गठित की है जो पुनर्स्थापना, संरक्षण और पर्यटन विकास के लिए विस्तृत योजना तैयार करेगी।