स्वास्थ्य मंत्री सत्य कुमार यादव ने आगामी गणेश चतुर्थी के लिए पर्यावरण के अनुकूल मिट्टी की मूर्तियों के उपयोग की अपील की है। उन्होंने जल संकट और रासायनिक रंगों के दुष्प्रभावों को देखते हुए प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) का त्याग करने का आग्रह किया है।

  • स्वास्थ्य मंत्री ने पीओपी और रासायनिक रंगों वाली मूर्तियों के बजाय मिट्टी की मूर्तियों के उपयोग पर जोर दिया।
  • अल नीनो के कारण घटते जल स्तर को देखते हुए छोटे आकार की मूर्तियों की स्थापना का सुझाव दिया गया।
  • तिरुपति विनायक उत्सव समिति की बैठक में पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया गया।

आगामी गणेश चतुर्थी उत्सव के मद्देनजर, आंध्र प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सत्य कुमार यादव ने जनता से एक महत्वपूर्ण अपील की है। सोमवार को तिरुपति में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान, उन्होंने आग्रह किया कि नागरिक इस वर्ष केवल पर्यावरण के अनुकूल मिट्टी की मूर्तियों की स्थापना करें और प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) या हानिकारक रासायनिक रंगों से बनी मूर्तियों का पूरी तरह से त्याग करें।

यह बैठक तिरुपति विनायक उत्सव समिति द्वारा आयोजित की गई थी, जो पिछले 25 वर्षों से गणेश उत्सव के प्रबंधन, पंडालों की स्थापना से लेकर मूर्ति विसर्जन तक का सफल समन्वय कर रही है। मंत्री ने रेखांकित किया कि उत्सव की भव्यता प्रकृति की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

पर्यावरण और जल संकट का गहरा संबंध

मंत्री यादव ने एक गंभीर चिंता व्यक्त की कि अल नीनो (El Niño) के प्रभावों के कारण जलाशयों और टैंकों में जल स्तर काफी कम हो गया है। इस संकट को देखते हुए, उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इस वर्ष गलियों के कोनों, गेटेड समुदायों और अपार्टमेंटों में छोटे आकार की मूर्तियों की स्थापना करें ताकि जल संसाधनों पर दबाव कम हो सके।

विनायक प्रकृति से जुड़े हैं; वे हल्दी के रूप में बहते पानी में विलीन हो जाते हैं, लेकिन आधुनिक सिंथेटिक विकल्प हमारे जल निकायों को प्रदूषित कर रहे हैं।

मंत्री ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि भगवान गणेश का मूल स्वरूप प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने वाला है। पारंपरिक रूप से, गणेश जी को हल्दी के पेस्ट के रूप में पूजा जाता था, जो पानी में मिलकर बिना कोई अवशेष छोड़े विलीन हो जाता था। उन्होंने कहा कि आज के समय में 'आकर्षक' दिखने के चक्कर में हम सिंथेटिक और हानिकारक विकल्पों की ओर बढ़ गए हैं, जो गलत है।

BozokMedia विश्लेषण: क्यों यह बदलाव जरूरी है

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, धार्मिक उत्सवों के दौरान जल प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा पीओपी और भारी धातुओं से युक्त रंगों से आता है। यदि बड़े पैमाने पर मिट्टी की मूर्तियों की ओर वापसी नहीं की गई, तो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और जलीय जीवन को अपूरणीय क्षति हो सकती है।

इस बैठक में आंध्र प्रदेश हस्तशिल्प विकास निगम के अध्यक्ष पसुपुलेती हरिप्रसाद, ए.पी. यदुवा कल्याण निगम के अध्यक्ष जी. नरसिम्हा यादव और अन्य प्रमुख गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। सभी ने मिलकर इस वर्ष एक हरित और स्वच्छ उत्सव मनाने का संकल्प लिया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

प्राचीन भारतीय परंपराओं में, मूर्तियों का निर्माण प्राकृतिक मिट्टी, गोबर और हल्दी जैसे तत्वों से किया जाता था। यह न केवल धार्मिक रूप से शुद्ध माना जाता था, बल्कि विसर्जन के बाद मिट्टी वापस प्रकृति में मिल जाती थी, जिससे जल चक्र में कोई बाधा नहीं आती थी।

Did You Know?: पारंपरिक मिट्टी की मूर्तियाँ विसर्जन के बाद पानी में घुल जाती हैं, जिससे वे पौधों के लिए उर्वरक का काम करती हैं।

Frequently Asked Questions

1. पीओपी (PoP) की मूर्तियाँ पर्यावरण के लिए हानिकारक क्यों हैं?
प्लास्टर ऑफ पेरिस पानी में नहीं घुलता और जल निकायों में ऑक्सीजन के स्तर को कम कर देता है, जिससे जलीय जीवन मर जाता है।

2. मंत्री ने छोटी मूर्तियों का सुझाव क्यों दिया?
अल नीनो के कारण जल स्तर कम होने के कारण, कम पानी के उपयोग और जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए छोटी मूर्तियों की सिफारिश की गई है।