जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के दो अलग-अलग गुटों के बीच वैचारिक बदलाव और संपत्ति के कब्जे को लेकर सार्वजनिक विवाद बढ़ गया है। जस्टिस डेवलपमेंट फ्रंट (JDF) और मूल जमात के बीच आरोपों का दौर जारी है।

  • जमात-ए-इस्लामी के दो गुटों के बीच वैचारिक मतभेद और संपत्ति विवाद सार्वजनिक हुआ।
  • JDF के नेताओं ने मूल गुट द्वारा 'गद्दार' और 'बिकाऊ' जैसे शब्दों के इस्तेमाल का आरोप लगाया।
  • पूर्व प्रमुख गुलाम मोहम्मद भट्ट ने JDF की राजनीतिक गतिविधियों और 'समाजवाद' के इस्तेमाल पर सवाल उठाए।
  • विवाद का केंद्र फलाह-ए-आम ट्रस्ट की संपत्ति का उपयोग है।

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक नया मोड़ तब आया जब प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी (JeI) के दो गुटों के बीच सार्वजनिक रूप से तीखी बहस छिड़ गई। सोमवार को श्रीनगर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, जमात के टूटकर निकले गुट, जस्टिस डेवलपमेंट फ्रंट (JDF) के नेताओं ने मूल संगठन पर गंभीर आरोप लगाए।

JDF के प्रमुख नेताओं, जिनमें गुलाम कादिर वानी और अहमदुल्ला परयार मलिक शामिल हैं, ने आरोप लगाया कि मूल जमात के सदस्य उनके समर्थकों के बीच संदेह पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि समर्थकों को 'गद्दार' और 'बिकाऊ' जैसे लेबल देकर भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह विवाद केवल दो गुटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि कश्मीर में धार्मिक संगठनों के राजनीतिकरण और उनके भविष्य की दिशा को लेकर एक बड़ा संघर्ष है। एक तरफ मूल जमात कानूनी लड़ाई और शांतिपूर्ण विचारधारा की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ JDF ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संविधान के दायरे में रहकर काम करने का रास्ता चुना है।

पूर्व जमात प्रमुख गुलाम मोहम्मद भट्ट ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर JDF की गतिविधियों से दूरी बनाई। उन्होंने JDF के चुनावी घोषणापत्र में 'समाजवाद' शब्द के उपयोग पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यह विचारधारा इस्लाम के मूल सिद्धांतों से मेल नहीं खाती। भट्ट ने यह भी आरोप लगाया कि JDF प्रतिबंधित जमात की संपत्तियों को हड़पने की कोशिश कर रहा है।

यह आंतरिक कलह दर्शाती है कि कश्मीर में प्रतिबंधित संगठनों के भीतर सत्ता और विचारधारा को लेकर गहरा विभाजन पैदा हो चुका है।

जवाब में, गुलाम कादिर वानी के नेतृत्व वाले पैनल ने स्पष्ट किया कि उन्होंने सरकार से अनुमति लेकर राजनीतिक मंच बनाने का निर्णय लिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका उद्देश्य देश की अखंडता को चुनौती देना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक माध्यमों से मुद्दों को हल करना है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि गृह मंत्रालय (MHA) ने 2019 में कई अलगाववादी संगठनों के साथ जमात-ए-इस्लामी पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। इस प्रतिबंध के बाद संगठन के भीतर दरारें आईं, जिसके परिणामस्वरूप JDF जैसे नए राजनीतिक स्वरूप का उदय हुआ, जिसने 2024 के विधानसभा चुनावों में भाग लिया।

क्या आप जानते हैं?: फलाह-ए-आम ट्रस्ट, जो जमात से जुड़ा था, मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर के शिक्षा क्षेत्र में काम करने के लिए जाना जाता था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. JDF और जमात-ए-इस्लामी के बीच मुख्य विवाद क्या है?
मुख्य विवाद वैचारिक बदलाव, राजनीतिक भागीदारी और फलाह-ए-आम ट्रस्ट की संपत्ति के उपयोग को लेकर है।

2. जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध कब लगा था?
भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने 2019 में इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया था।