बेंगलुरु में कम कार्बन उत्सर्जन वाली इमारतों का चलन बढ़ रहा है, लेकिन एक नए अध्ययन से पता चला है कि इससे निर्माण श्रमिकों की मजदूरी या कार्य स्थितियों में कोई सुधार नहीं हुआ है। कई श्रमिक अभी भी राज्य द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से कम पर काम कर रहे हैं।
- बेंगलुरु में ग्रीन बिल्डिंग्स के बावजूद श्रमिकों की मजदूरी में कोई वृद्धि नहीं देखी गई।
- बड़े प्रोजेक्ट्स में अकुशल श्रमिकों को ₹500 प्रतिदिन मिल रहे हैं, जो न्यूनतम वेतन ₹669.61 से कम है।
- कम कार्बन उत्सर्जन वाले प्रोजेक्ट्स और पारंपरिक प्रोजेक्ट्स की कार्य स्थितियों में कोई खास अंतर नहीं है।
बेंगलुरु शहर तेजी से 'ग्रीन बिल्डिंग्स' और कम कार्बन उत्सर्जन वाले निर्माण की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, WRI इंडिया के एक हालिया वर्किंग पेपर 'Decent green jobs as a pathway for fair urban transitions' ने एक कड़वी सच्चाई उजागर की है। अध्ययन के अनुसार, शहर की इमारतों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों का लाभ उन मजदूरों तक नहीं पहुँच रहा है जो इन इमारतों को वास्तव में खड़ा कर रहे हैं।
अध्ययन में पाया गया कि बड़े और कोड-अनुपालन वाले प्रोजेक्ट्स में अकुशल श्रमिकों की दैनिक मजदूरी मात्र ₹500 तक है, जबकि कर्नाटक राज्य का अनिवार्य न्यूनतम वेतन ₹669.61 है। इसके विपरीत, छोटे प्रोजेक्ट्स में मजदूरी ₹700 से ₹1,000 के बीच है, जो यह दर्शाता है कि बड़े कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट्स में भी श्रमिकों का शोषण जारी है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि केवल 'पर्यावरण अनुकूल' बुनियादी ढांचा बनाना पर्याप्त नहीं है। जब तक 'ग्रीन ट्रांज़िशन' में सामाजिक न्याय और उचित वेतन को शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक यह केवल एक कॉर्पोरेट दिखावा बनकर रह जाएगा। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि जलवायु लक्ष्यों और श्रम अधिकारों के बीच एक गहरा अंतराल है।
अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि पुराने भवनों की रेट्रोफिटिंग और निर्माण मलबे के प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। राजमिस्त्री, बढ़ई और इलेक्ट्रीशियन कम कार्बन वाली सामग्रियों और तकनीकों को सीखकर 'ग्रीन जॉब्स' में प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन केवल कौशल विकास से वेतन नहीं बढ़ेगा जब तक कि नीतिगत बदलाव न हों।
"जलवायु कार्रवाई को केवल कार्बन उत्सर्जन कम करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे श्रमिकों की भेद्यता को कम करने और उनके कल्याण को सुनिश्चित करने का माध्यम बनना चाहिए।"
प्रवासी श्रमिकों की स्थिति और भी चिंताजनक है। हालांकि निर्माण क्षेत्र कृषि की तुलना में अधिक भुगतान करता है, लेकिन प्रवासी मजदूर अक्सर भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड (BOCW Board) द्वारा प्रदान किए जाने वाले कानूनी लाभों और entitlements तक पहुँचने में विफल रहते हैं।
| प्रोजेक्ट का प्रकार | दैनिक मजदूरी (लगभग) | कार्य स्थिति / सुरक्षा |
|---|---|---|
| बड़े कोड-अनुपालन प्रोजेक्ट्स | ₹500 (न्यूनतम से कम) | बेहतर सुरक्षा, अधिक रोजगार दिन |
| छोटे निर्माण प्रोजेक्ट्स | ₹700 - ₹1,000 | कम सुरक्षा, अनिश्चित रोजगार |
सुरक्षा के मोर्चे पर भी कोई खास सुधार नहीं देखा गया है। अध्ययन के अनुसार, चाहे इमारत 'लो-कार्बन' प्रमाणित हो या पारंपरिक, सुरक्षा मानकों का कार्यान्वयन एक समान नहीं है। विशेष रूप से अत्यधिक गर्मी जैसे पर्यावरणीय तनावों से निपटने के लिए मौजूदा सुरक्षा नियम अपर्याप्त हैं।
Frequently Asked Questions
1. WRI इंडिया के अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष क्या है?
मुख्य निष्कर्ष यह है कि ग्रीन बिल्डिंग्स के संक्रमण से श्रमिकों की मजदूरी या कार्य स्थितियों में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया है और कई श्रमिक न्यूनतम वेतन से कम पर काम कर रहे हैं।
2. निर्माण श्रमिकों के लिए कौन से नए अवसर पैदा हो सकते हैं?
पुराने भवनों की रेट्रोफिटिंग, निर्माण अपशिष्ट प्रबंधन और लो-कार्बन सामग्री के उपयोग में विशेषज्ञता हासिल करने से नए 'ग्रीन जॉब्स' मिल सकते हैं।