हुर्रियात कॉन्फ़्रेंस के अध्यक्ष मिर्वैज़ उमर फारूक ने पाकिस्तान को पोक में बढ़ते दंगे को संवाद के माध्यम से सुलझाने की पुकार की। उन्होंने रावलाकोट व पूंच में नागरिकों और पुलिस के शहीदों को याद कर दोनों पक्षों से संयम का आग्रह किया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- पाकिस्तान‑कब्जा कश्मीर में 12 आरक्षित सीटों को लेकर विवाद तेज़
- हुर्रियात के मिर्वैज़ ने संवाद व संयम की मांग की
- जुलाई 27 को निर्धारित चुनावों पर संभावित असर
हुर्रियात कॉन्फ़्रेंस के प्रमुख मिर्वैज़ उमर फारूक ने 16 जुलाई को पाकिस्तान को पोक (पाकिस्तान‑कब्जा कश्मीर) में बढ़ते दंगे को संवाद और परामर्श के माध्यम से सुलझाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि लोकेशन के दूसरी ओर रावलाकोट और पूंच में हुए हिंसक टकराव में नागरिकों व पुलिस की मौतें "गहरा दुःख" उत्पन्न करती हैं और सभी पक्षों को संयम बरतने की आवश्यकता है।
पोक में विवाद का मूल कारण
विवाद का केंद्र बिंदु पोक के विधान सभा में 12 सीटों की आरक्षित स्थिति है, जो 1947 के बाद पाकिस्तान में प्रवास कर चुके कश्मीरी शरणार्थियों के लिये निर्धारित हैं। पाकिस्तान‑आधारित राजनीतिक दल इन सीटों का उपयोग करके 53‑सदस्यीय विधानसभा में प्रभाव स्थापित करने का दावा करते हैं, जबकि विरोध करने वाले समूह इन आरक्षित सीटों को हटाने की माँग कर रहे हैं।
क़ानूनी पृष्ठभूमि और चुनावी माहौल
जून में एक अदालत ने इन आरक्षित सीटों को संविधानिक रूप से सुरक्षित करार दिया, जिससे उन्हें केवल संवैधानिक संशोधन के माध्यम से ही हटाया जा सकता है। इस फैसले के बाद भी विरोध प्रदर्शन तेज़ होते गए, और मंगलवार को पुलिस व प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव में कम से कम नौ लोगों की मौत हो गई। इस बीच, पोक में 27 जुलाई को नियोजित विधानसभा चुनाव निकट आ रहे हैं, जिससे राजनीतिक तनाव और बढ़ सकता है।
मिर्वैज़ की संवाद‑आधारित अपील
मिर्वैज़ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पहचान, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक अधिकारों से जुड़े प्रश्नों को “संवेदनशीलता, संवाद और जनता के व्यापक विश्वास” के साथ निपटा जाना चाहिए। उन्होंने इस बात को दोहराते हुए कहा कि “संघर्ष की जगह परामर्श और समझौता होना चाहिए” और दोनों पक्षों को “संयम और सहभागिता” को प्राथमिकता देनी चाहिए।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि संवाद की प्रक्रिया विफल रहती है, तो पोक में हिंसा का विस्तार, चुनावी प्रक्रिया में बाधा और क्षेत्रीय स्थिरता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की मध्यस्थता, साथ ही भारत‑पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक संवाद, इस संवेदनशील मुद्दे को हल करने में मददगार हो सकते हैं।