जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 20 जुलाई को दिल्ली में जंतर मंच पर राज्यत्व बहाली का प्रदर्शन आयोजित करने की पुष्टि की। राष्ट्रीय कांग्रेस ने 52 राजनीतिक हस्तियों को इस फ़ेडरलिज़्म‑आधारित आंदोलन में शामिल होने का निमंत्रण भेजा है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • उमर अब्दुल्ला ने 20 जुलाई को दिल्ली में राज्यत्व बहाली का प्रदर्शन तय किया।
  • राष्ट्रीय कांग्रेस ने 52 प्रमुख राजनेताओं को इस आंदोलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया।
  • कांग्रेस ने ‘स्टेटहूड प्लस’ की माँग रखी – भूमि, रोजगार और संवैधानिक अधिकारों की गारंटी।

जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 16 जुलाई को बताया कि उनके दल का 20 जुलाई को दिल्ली में आयोजित किया गया प्रदर्शन निश्चित रहेगा, जबकि उनके चाचा, नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता डॉ. मुस्तफा कमाल की अचानक मृत्यु के शोक में भी यह कदम जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि यदि जंतर मंच से अनुमति नहीं मिलती, तो दल दिल्ली पहुँच कर सामूहिक रूप से अगला कदम तय करेगा।

पृष्ठभूमि और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

2019 में भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद‑370 को निरस्त कर जम्मू‑कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने का निर्णय अभी भी क्षेत्र में व्यापक विरोध का कारण बना हुआ है। इस निर्णय को राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख फ़ारूक अब्दुल्ला ने “गहराई से त्रुटिपूर्ण” कहा और 20 जुलाई को “फ़ेडरलिज़्म का कारण” बताया। इस संदर्भ में, राष्ट्रीय कांग्रेस ने 52 प्रमुख राजनैतिक हस्तियों, जिनमें सोनिया और राहुल गांधी भी शामिल हैं, को एक औपचारिक आमंत्रण भेजा है।

सहयोगी पार्टियों की स्थिति

कांग्रेस ने राज्यत्व बहाली के साथ-साथ “स्टेटहूड प्लस” की माँग रखी है, जिसमें भूमि अधिकार, रोजगार की गारंटी और संविधानिक सुरक्षा शामिल है। कांग्रेस के सांसद पवन खेड़ा ने कहा, “हम हमेशा राज्यत्व प्लस में विश्वास रखते हैं—भू‑संपदा, नौकरी और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा।” वहीं, पीडपी के अध्यक्ष मेहबूबा मुठी के प्रति राष्ट्रीय कांग्रेस के निमंत्रण पर पीडपी ने अभी तक कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया, परन्तु उन्होंने कांग्रेस का धन्यवाद किया कि वह जम्मू‑कश्मीर के “विस्थापन” के वास्तविक मुद्दों को उजागर कर रहा है।

भविष्य की संभावनाएँ

यदि जंतर मंच से अनुमति मिलती है, तो प्रदर्शन शांतिपूर्ण रूप से जारी रहेगा; अन्यथा, दल दिल्ली में एकत्रित होकर आगे की रणनीति तय करेगा। यह आंदोलन न केवल जम्मू‑कश्मीर में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राज्यत्व, स्वायत्तता और केंद्र‑राज्य संबंधों पर नई बहस को जन्म दे सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बड़े पैमाने के प्रदर्शन से सरकार को पुनः संवाद की दिशा में कदम बढ़ाने का दबाव बन सकता है।