अमन आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अरविंद केजरीवाल ने जंतरMantार में सोनम वंगचुक के भूख हड़ताल में शामिल होकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की और युवाओं की माँगों को अनदेखा करने पर 2014 जैसा परिणाम चेतावनी दी।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • केजरीवाल ने जंतर Mantार में सोनम वंगचुक की भूख हड़ताल का समर्थन किया।
  • धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और वंगचुक को शिक्षा मंत्री नियुक्त करने का प्रस्ताव दिया गया।
  • दिल्ली हाई कोर्ट ने वंगचुक की स्वास्थ्य स्थिति की दैनिक निगरानी का आदेश दिया।

अमन आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता अरविंद केजरीवाल ने गुरुवार को जंतर Mantार में युवा-नेतृत्व वाली विरोध प्रदर्शनी में भाग लिया, जहाँ लद्दाख के अभियंता‑शिक्षा सुधारक एवं जलवायु कार्यकर्ता सोनम वंगचुक ने 19वें दिन तक अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल जारी रखी थी। केजरीवाल ने केंद्र सरकार को युवाओं की मांगों पर ध्यान देने की कड़ी चेतावनी दी, अन्यथा 2014 के समान राजनीतिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

प्रदर्शन का पृष्ठभूमि

वंगचुक का आंदोलन 2026 के नेशनल एग्ज़ामिनेशन एंट्रेंस टेस्ट (NEET‑UG) में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक विवाद को लेकर शुरू हुआ था। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा नीति में पारदर्शिता, परीक्षा सुरक्षा और छात्रों के अधिकारों की माँग की, जिससे देश भर के युवा छात्रों ने जंतर Mantार में एकत्रित होकर समर्थन दिया।

केजरीवाल का राजनीतिक संदेश

समारोह में केजरीवाल ने तीखा राजनीतिक संदेश दिया: “युवा, आंदोलन और सोनम वंगचुक की बात सुनें, नहीं तो तीन साल बाद आपको 2014 जैसा भाग्य झेलना पड़ेगा।” उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की और प्रस्ताव रखा कि वंगचुक को शिक्षा मंत्री नियुक्त किया जाए। यह बयान केवल शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि सरकार के युवा वर्ग के साथ संबंध बिगड़ने पर संभावित वोट‑खोने की चेतावनी भी थी।

न्यायिक हस्तक्षेप

इसी बीच, दिल्ली हाई कोर्ट ने वंगचुक की स्वास्थ्य स्थिति की दैनिक क्लिनिकल मॉनिटरिंग का आदेश दिया। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायाधीश तेजस कारिया ने कहा कि “हर नागरिक का जीवन अनमोल है, और सरकार को इसे बचाने के सभी उपाय करने चाहिए।” कोर्ट ने सरकारी डॉक्टरों की राय के आधार पर किसी भी आवश्यक चिकित्सा हस्तक्षेप को तुरंत प्रदान करने का भी निर्देश दिया। यह आदेश सार्वजनिक हित याचिका (PIL) के बाद आया, जो हड़तालकर्ता की स्वास्थ्य‑सुरक्षा को लेकर उठाया गया था।

भविष्य की संभावनाएँ

यदि केजरीवाल की मांगें पूरी होती हैं, तो शिक्षा मंत्रालय में बड़े बदलाव की संभावना है, जिससे परीक्षा‑सुरक्षा, पाठ्यक्रम सुधार और जलवायु शिक्षा जैसे क्षेत्रों में नई नीतियों का मार्ग खुल सकता है। वहीं, यदि सरकार इस आंदोलन को अनदेखा करती है, तो युवा वर्ग के बीच असंतोष गहरा हो सकता है, जिससे आगामी चुनावों में वोट‑बेस पर असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर, यह संघर्ष भारत के शिक्षा‑नीति और राजनीति के बीच नई गतिशीलता को उजागर कर रहा है।