पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी नई पुस्तक 'द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड' के माध्यम से भारतीय सेना के अनकहे इतिहास और मिथकों को उजागर किया है। इसमें 'Mhow' के नाम का सच और युद्ध के मैदान में वीरता दिखाने वाले खच्चर 'पेडोंगी' की अद्भुत कहानी शामिल है।
- जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की नई पुस्तक 'द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड' का पुणे में विमोचन किया गया।
- पुस्तक में 'Mhow' के नाम से जुड़े प्रचलित सैन्य मिथक का खंडन किया गया है।
- 1971 के युद्ध के दौरान वीरता दिखाने वाले प्रसिद्ध खच्चर 'पेडोंगी' की कहानी का वर्णन है।
- यह पुस्तक सेना की संस्कृति, परंपराओं और लोककथाओं पर केंद्रित है।
पुणे में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान, पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (सेवानिवृत्त) ने अपनी नवीनतम पुस्तक, 'The Curious and the Classified: Unearthing Military Myths and Mysteries' का अनावरण किया। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने भारतीय सेना के उन पहलुओं को सामने रखा है जो अब तक आम जनता की नज़रों से ओझल रहे हैं।
जनरल नरवणे ने बताया कि इस पुस्तक की प्रेरणा उन्हें प्रसिद्ध लेखक शशि थरूर की पुस्तक 'ए वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स' से मिली। उन्होंने कहा कि जैसे कई शब्दों के पीछे छिपे अर्थ (Backronyms) होते हैं, वैसे ही सेना में भी कई ऐसे मिथक हैं जो सच नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने Mhow का जिक्र किया।
Mhow का रहस्य और सैन्य मिथक
अक्सर लोग मानते हैं कि 'Mhow' का अर्थ 'Military Headquarters of War' है, लेकिन जनरल नरवणे ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक मिथक है। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश काल के दौरान वास्तविक मुख्यालय शिमला में हुआ करता था, जहाँ से कमांडर-इन-चीफ अफगानिस्तान से बर्मा तक के सभी ऑपरेशनों को नियंत्रित करते थे। यह पुस्तक ऐसे ही कई भ्रामक तथ्यों को वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से स्पष्ट करती है।
यह पुस्तक केवल सूचना देने के लिए नहीं है, बल्कि यह उन परंपराओं और रेजिमेंटों की संस्कृति को समझने का एक जरिया है जो हमें आज एक मजबूत सेना के रूप में परिभाषित करती हैं।
पेडोंगी: युद्ध के मैदान का नायक
पुस्तक का सबसे भावुक और प्रेरणादायक हिस्सा 'पेडोंगी' नामक एक खच्चर की कहानी है। 1971 के युद्ध के दौरान, एक खच्चर का काफिला दुश्मन के कब्जे में आ गया था। उस खच्चर पर मशीन गन और गोला-बारूद लदा था। युद्ध की अफरा-तफरी और धुंध के बीच, वह खच्चर अपनी सहज प्रवृत्ति (instinct) से बमबारी और बारूदी सुरंगों के बीच से रास्ता बनाते हुए अपनी यूनिट के पास वापस आ गया।
उसकी इस असाधारण बहादुरी को देखते हुए, भारतीय सेना के इतिहास में पहली बार किसी खच्चर को नाम दिया गया—'पेडोंगी'। उसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी स्थान मिला और आर्मी सर्विस कोर के मेस में एक लाउंज भी उसके नाम पर रखा गया है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि इस तरह के वृत्तांत न केवल सैन्य इतिहास को समृद्ध करते हैं, बल्कि सैनिकों और नागरिकों के बीच सेना की मानवीय और सांस्कृतिक छवि को भी मजबूत करते हैं। यह पुस्तक सैन्य इतिहास के 'क्लासिफाइड' यानी गुप्त लगने वाले तथ्यों को सार्वजनिक संवाद का हिस्सा बनाती है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: जनरल नरवणे की नई पुस्तक का विषय क्या है?
उत्तर: यह पुस्तक भारतीय सेना के मिथकों, रहस्यों, परंपराओं और अनकही कहानियों के बारे में है।
प्रश्न 2: 'पेडोंगी' कौन था?
उत्तर: पेडोंगी भारतीय सेना का एक प्रसिद्ध खच्चर था जिसने 1971 के युद्ध में अद्भुत साहस दिखाया था।