राज्य द्वारा की जा रही 'बुलडोजर कार्रवाई' और 'ऑपरेशन लंगड़ा' जैसी प्रक्रियाओं का विश्लेषण, जो कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर राज्य हिंसा को वैध बना रही हैं।

  • 'बुलडोजर जस्टिस' और 'ऑपरेशन लंगड़ा' जैसे कदम एक ऐसे 'नियंत्रण की संस्कृति' को दर्शाते हैं जहाँ कानूनी प्रक्रिया से अधिक दंडात्मक उपायों को प्राथमिकता दी जा रही है।
  • अदालती देरी और न्याय प्रणाली में विफलता के कारण जनता अब राज्य द्वारा की जाने वाली गैर-कानूनी कार्रवाइयों का समर्थन करने लगी है।
  • आपराधिक कानून अब न्याय का साधन बनने के बजाय राज्य द्वारा दबाव बनाने और डराने का हथियार बनता जा रहा है।

भारत में कानून प्रवर्तन का स्वरूप एक चिंताजनक मोड़ ले रहा है। 'बुलडोजर जस्टिस' और पैरों में गोली मारने वाले अभियानों (जिन्हें 'ऑपरेशन लंगड़ा' कहा जाता है) को 'सफलता की कहानियों' के रूप में पेश किया जा रहा है। यह राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसा का एक नया औचित्य है, जो डेविड गार्लैंड के 'नियंत्रण की संस्कृति' (culture of control) के विचार की याद दिलाता है, जहाँ असुरक्षा और सार्वजनिक क्रोध अपराध-नियंत्रण नीतियों को हिंसक और दंडात्मक बना देते हैं।

सबसे दुखद तथ्य यह है कि आम जनता इन प्रथाओं का समर्थन कर रही है, जबकि ये पूरी तरह से कानून के अनुशासन के बाहर हैं। जब राज्य कानून लागू करने के नाम पर हिंसा करता है, तो वह हिंसा, जिसे सामान्यतः 'गुंडागर्दी' कहा जाता, अचानक 'न्याय' के रूप में वैध लगने लगती है। यह इस बात का संकेत है कि लोगों का कानूनी प्रक्रिया (due process) से विश्वास उठ चुका है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि इन 'शॉर्टकट' का समर्थन करना वास्तव में व्यवस्था की विफलता का लक्षण है। जब लोग कानूनी संस्थानों को निष्पक्ष और भरोसेमंद नहीं मानते, तो वे राज्य द्वारा किए गए अवैध कार्यों को भी सही मानने लगते हैं। यह स्थिति समाज में एक खतरनाक मिसाल कायम करती है, जहाँ लोग निजी तौर पर भी कानून हाथ में लेने के लिए प्रेरित होते हैं।

इसके अलावा, आपराधिक न्याय प्रणाली में 'करुणा की कमी' (compassion deficit) स्पष्ट दिख रही है। मुकदमे के फैसले से पहले ही गिरफ्तारी, हिरासत, छापेमारी और सार्वजनिक अपमान को सजा के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह इस डर का परिणाम है कि औपचारिक न्याय प्रणाली या तो बहुत धीमी है या अप्रभावी।

जब 'अधिकतम आपराधिक कानून' का विस्तार होता है, तो कानूनी प्रणाली निर्दोषों के लिए ढाल बनने के बजाय राज्य के लिए दमन का हथियार बन जाती है।

न्याय की अवधारणा स्वयं संकट में है। केवल केस का निपटारा होना 'न्याय' नहीं है। निल्स क्रिस्टी के अनुसार, आधुनिक न्याय प्रणाली संघर्षों को पीड़ितों और अपराधियों से छीनकर पेशेवरों और संस्थानों को सौंप देती है, जिससे वास्तव में प्रभावित व्यक्ति की आवाज दब जाती है।

भारत में अपराध दर के आंकड़े और वास्तविकता के बीच एक बड़ा अंतर है। छोटी-मोटी गलतियों के लिए बड़ी संख्या में लोगों को जेल भेजना हमारी डिफ़ॉल्ट कार्यप्रणाली बन गई है। यही विफलता राज्य को 'बुलडोजर जस्टिस' जैसे खतरनाक नवाचारों की ओर धकेलती है।

क्या आप जानते हैं?: प्रक्रियात्मक न्याय (Procedural Justice) सिद्धांत कहता है कि लोग कानून का पालन केवल सजा के डर से नहीं, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि वे कानूनी प्रक्रिया को निष्पक्ष मानते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: 'बुलडोजर जस्टिस' क्या है?
यह आरोपी व्यक्तियों की संपत्ति को न्यायिक सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया के बिना ही राज्य अधिकारियों द्वारा ध्वस्त करने की प्रथा है।

प्रश्न 2: 'न्यूनतम अपराधीकरण' (Minimalist Criminalisation) क्यों जरूरी है?
इसका अर्थ है कि आपराधिक कानून का उपयोग केवल अत्यंत गंभीर मामलों में अंतिम विकल्प के रूप में किया जाना चाहिए, ताकि राज्य इसे सामान्य नियंत्रण के उपकरण के रूप में इस्तेमाल न करे।