मदुरै बेंच ने पलाई मठ की 1.35 एकड़ भूमि के विवादित बिक्री दस्तावेज़ को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने एकल बेंच के आदेश को ‘अवैध’ घोषित करके मठ को अपनी संपत्ति पर अधिकार सुरक्षित किया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- विभागीय बेंच ने पलाई मठ की जमीन की बिक्री को रद्द किया
- एकल बेंच ने बिना पक्ष को सुनाए रजिस्ट्रेशन जारी किया, जो अनैतिक माना गया
- सब‑रजिस्ट्री अधिकारी को निलंबित किया गया, प्रत्याशित जमानत के लिए हाई कोर्ट में आवेदन किया
मदुरै बेंच, मद्रास हाई कोर्ट ने 15 जुलाई 2026 को पलाई मठ (अरुल्मिगु धंदापानी स्वामीगाल मदाम) द्वारा दायर अपील को स्वीकार किया और 1.35 एकड़ जमीन के विवादास्पद बिक्री दस्तावेज़ को ‘शून्य और निरस्त’ कर दिया। यह निर्णय दो न्यायाधीशों – सी.वी. कार्थिकेयन और आर. सक्थीवेल – के विभाजन बेंच द्वारा सुनाया गया।
पृष्ठभूमि और कानूनी पहलू
एकल बेंच ने प्रारम्भ में सब‑रजिस्ट्री को निर्देश दिया था कि यदि दस्तावेज़ सही हो तो बिक्री deed को रजिस्टर किया जाए। मठ ने दावा किया कि उसे पक्षकार नहीं बनाया गया और उसकी आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया। न्यायालय ने कहा कि ऐसी प्रक्रिया कानून के विरुद्ध है, क्योंकि किसी भी वाद विवाद में सभी पक्षों को सुनना अनिवार्य है।
मठ का तर्क और अदालत का फैसला
मठ ने बताया कि एकल बेंच ने बिना आवश्यक सुनवाई के ही व्रिट पिटिशन को स्वीकार कर लिया, जिससे मठ की संपत्ति को निजी ट्रस्ट के रूप में बेचा गया। न्यायालय ने इस बात को रेखांकित किया कि सब‑रजिस्ट्री अधिकारी को मठ की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए रजिस्ट्रेशन नहीं करना चाहिए था। इस कारण, बिक्री deed को आगे बढ़ाना ‘अनावश्यक परेशानियों’ को जन्म देगा।
सब‑रजिस्ट्री अधिकारी की स्थिति
दस्तावेज़ रजिस्टर करने वाले जस्टिन मणिकंदन सुब्रमणियन ने हाई कोर्ट में प्रत्याशित जमानत के लिए आवेदन किया, जबकि उन्हें निलंबित किया गया था। उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल कोर्ट के आदेश के आधार पर रजिस्ट्रेशन पूरा किया। साथ ही, जिला रजिस्ट्री सासिकाला को भी निलंबित किया गया है। न्यायाधीश के. राजसेकर ने अपराध शाखा‑जांच विभाग से प्रतिक्रिया मांगी और मामले को 17 जुलाई को पुनः सुनवाई के लिए निर्धारित किया।
भविष्य की संभावनाएँ
यह निर्णय न केवल पलाई मठ की भूमि सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि धार्मिक संस्थानों की संपत्ति संरक्षण में न्यायिक निगरानी को भी उजागर करता है। यदि अदालत इस दिशा में और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करती है, तो भविष्य में समान विवादों में पक्षकारों को उचित सुनवाई सुनिश्चित करने की संभावना बढ़ेगी।