श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) ने विदेशों में गैर-पारंपरिक तिथियों पर रथ यात्रा आयोजित करने के इस्कॉन के शास्त्रोक्त दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। मंदिर प्रशासन ने इस्कॉन पर दुनिया भर के भक्तों को गुमराह करने और पुरी के गजपति महाराज के रुख को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) ने विदेशों में असमय रथ यात्रा आयोजित करने पर इस्कॉन (ISKCON) के दावों को खारिज किया।
  • SJTA ने इस्कॉन पर वैश्विक स्तर पर जगन्नाथ भक्तों को गुमराह करने का आरोप लगाया है।
  • पुरी के गजपति महाराज दिब्यसिंह देब के कथित समर्थन को लेकर भी मंदिर प्रशासन ने कड़ी आपत्ति जताई है।
  • हिंदू पंचांग और शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को ही रथ यात्रा आयोजित करने का नियम है।

ओडिशा के पुरी में स्थित ऐतिहासिक श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) और इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) के बीच विवाद एक बार फिर गहरा गया है। मंदिर प्रशासन ने इस्कॉन के उन दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसमें विदेशों में पारंपरिक तिथि से अलग तिथियों पर रथ यात्रा आयोजित करने को शास्त्रों के अनुकूल बताया गया था। SJTA ने इस्कॉन पर दुनिया भर के सनातन धर्म के अनुयायियों को भ्रमित करने का गंभीर आरोप लगाया है।

शास्त्रों और पंचांग के नियमों की अनदेखी का आरोप

यह विवाद तब और बढ़ गया जब इस्कॉन के नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संचार कार्यालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दावा किया कि विदेशों में अलग-अलग तिथियों पर रथ यात्रा का आयोजन पूरी तरह से शास्त्रों के अनुसार है। इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, SJTA ने इस दावे को 'पूरी तरह से असत्य और भ्रामक' करार दिया। मंदिर प्रशासन के अनुसार, 20 मार्च 2025 को भुवनेश्वर में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में इस्कॉन के विद्वानों ने अपने तर्कों के समर्थन में कुछ पौराणिक ग्रंथों का हवाला दिया था, लेकिन पुरी के शीर्ष शास्त्रियों और पंडितों ने प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर उनके सभी तर्कों को खारिज कर दिया था।

गजपति महाराज की भूमिका पर विवाद

इस विवाद का एक और संवेदनशील पहलू पुरी के मानद राजा गजपति महाराज दिब्यसिंह देब से जुड़ा है। इस्कॉन ने संकेत दिया था कि गजपति महाराज ने जर्मनी के बर्लिन में आयोजित एक इस्कॉन रथ यात्रा में शामिल होकर इस तरह के आयोजनों को अपनी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष स्वीकृति दी थी। SJTA ने इस दावे को 'जानबूझकर किया गया शरारतपूर्ण कृत्य' बताया है। प्रशासन का कहना है कि गजपति महाराज की गरिमा और उनके 'आद्य सेवक' (भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक) के रूप में उनके दायित्वों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है, जो कि अत्यंत निंदनीय है।

पारंपरिक तिथि का महत्व

सनातन धर्म और विशेष रूप से जगन्नाथ संस्कृति में समय की पवित्रता का अत्यधिक महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की रथ यात्रा प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ही आयोजित की जानी चाहिए। ज्योतिषीय गणना और विशिष्ट ग्रह नक्षत्रों के संयोग से तय होने वाली इस तिथि को अपनी सुविधानुसार बदलना धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध माना जाता है। पुरी के सेवादारों और सनातन धर्मावलंबियों का मानना है कि इस तरह की असमय यात्राएं सदियों पुरानी परंपराओं की पवित्रता को ठेस पहुंचाती हैं।

वैश्विक प्रसार बनाम पारंपरिक मर्यादा

इस्कॉन के राष्ट्रीय प्रवक्ता युधिष्ठिर गोविंद दास ने इस पूरे विवाद पर फिलहाल कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अभी तक SJTA का आधिकारिक बयान नहीं देखा है। यह विवाद इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे एक तरफ वैश्विक स्तर पर हिंदू धर्म और जगन्नाथ संस्कृति का प्रचार-प्रसार हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ मूल परंपराओं और अनुष्ठानों की शुद्धता को बनाए रखने की चुनौती भी खड़ी हो गई है। आने वाले समय में दोनों संस्थाओं के बीच संवाद ही इस धार्मिक गतिरोध को सुलझाने का एकमात्र मार्ग हो सकता है।