जगन्नाथ मंदिर की शताब्दियों पुरानी पंचांग के अनुसार रथ यात्रा आयोजित की जाती है, जबकि ISKCON अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग तिथियों पर उत्सव का आयोजन कर रहा है। यह असहमति पूरी में तीव्र विरोध और धार्मिक अधिकार की लड़ाई का रूप ले ली है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- जगन्नाथ मंदिर की पंचांग के अनुसार रथ यात्रा 16 जुलाई को शुरू हुई।
- ISKCON ने 9 मई से 26 देशों में अलग तिथियों पर रथ यात्रा आयोजित की।
- पूरी के धार्मिक कार्यकर्ता और पुजारी इस परिवर्तन को मंदिर की धार्मिक पहचान पर हमला मान रहे हैं।
जगन्नाथ पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में हर साल रथ यात्रा का आयोजन शताब्दी‑पुराने पंचांग के अनुसार किया जाता है। 2026 की इस यात्रा की प्रमुख तिथि 16 जुलाई तय थी, जब तीन विशाल लकड़ी के रथों में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को ग्रैंड रोड (बड़ा डंडा) पर ले जाया गया। इस पवित्र अनुष्ठान का इतिहास सातवीं शताब्दी से जुड़ा है और यह ओडिशा के चार प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है।
ISKCON का अंतरराष्ट्रीय विस्तार
इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) ने इस वर्ष 9 मई से ही विश्वभर में रथ यात्रा का आयोजन शुरू किया, जिसमें एशिया, उत्तर अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के 26 स्थान शामिल हैं। भारत में मध्य प्रदेश में 66 स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिनमें दो स्थल 9‑दिवसीय शास्त्रीय अवधि के बाहर पड़ते हैं। ISKCON का तर्क है कि व्यावहारिक कारणों से, जैसे अंतरराष्ट्रीय श्रोताओं की भागीदारी और लॉजिस्टिक सुविधा, उन्हें मूल तिथि से अलग होना पड़ता है।
स्थानीय प्रतिक्रिया और आध्यात्मिक असहिष्णुता
पूरी के वरिष्ठ सांस्कृतिक कार्यकर्ता बड़्री मिश्रा (67) ने रथ के पास गुस्से में कहा, “यदि ISKCON पूरी में आएगा तो वह जगन्नाथ भक्तों की क्रोध का सामना करेगा।” कई स्थानीय श्रद्धालु ने इसे “श्री जगन्नाथ मंदिर की आध्यात्मिक अधिकारिता पर हमला” कहा। उन्होंने तुलना करते हुए कहा, “यदि कोई संस्था ईसाई धर्म के प्रमुख तीर्थस्थल पर अपने समय‑सारणी बदल दे तो क्या वह स्वीकार्य होगा?” इस प्रकार का विरोध केवल पुजारी वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि आम जनता तक भी फैला हुआ है।
राजनीतिक हस्तक्षेप और लिखित अपील
पूरी के शासकीय राजा दिव्यसिंह देव, जो जगन्नाथ के प्रमुख सेवक (अध्यसेवक) माने जाते हैं, ने 4 जुलाई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दो‑पृष्ठीय पत्र के साथ 152 पृष्ठ की संलग्नक भेजी। पत्र में ISKCON द्वारा रथ यात्रा और स्नान यात्रा को निर्धारित तिथियों के बाहर आयोजित करने की निंदा की गई और हस्तक्षेप की मांग की गई। ISKCON के गवर्निंग बॉडी कमिशन के अध्यक्ष मधु सेविता दास ने 7 जुलाई को कठोर उत्तर देते हुए कहा, “हम इस चर्चा से अब आगे नहीं बढ़ेंगे।” यह उत्तर स्थानीय समुदाय में असंतोष को और गहरा कर गया।
भविष्य की दिशा
भविष्य में यदि दोनों पक्ष आपसी संवाद के बिना अपनी‑अपनी समय‑सारणी जारी रखते हैं, तो धार्मिक विभाजन और सामाजिक तनाव बढ़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए सभी धार्मिक संगठनों को पारम्परिक पंचांग का सम्मान करना चाहिए, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैकल्पिक कार्यक्रम स्थानीय परम्पराओं के अनुकूल होना चाहिए।