जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलते ग्लेशियरों से बनी अस्थिर झीलों (GLOF) का खतरा तेजी से बढ़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, 1990 के बाद से इन झीलों के क्षेत्रफल में 50% की वृद्धि हुई है, जिससे हिमालयी क्षेत्रों सहित दुनिया भर के लाखों लोग विनाशकारी बाढ़ के मुहाने पर हैं।

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  • दुनिया भर में लगभग 1.5 करोड़ लोग ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के सीधे जोखिम में हैं।
  • 1990 के बाद से ग्लेशियल झीलों की संख्या और क्षेत्रफल में 50 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है।
  • 21वीं सदी के शुरुआती 25 वर्षों में ग्लेशियरों के पिघलने की दर पिछले 25 वर्षों की तुलना में दोगुनी हो गई है।
  • मध्य एशिया, विशेषकर भारत, नेपाल, चीन और पाकिस्तान सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल हैं।

नेपाल और तिब्बत की सीमा पर हाल ही में आई भीषण बाढ़ ने दुनिया को एक बार फिर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के गंभीर खतरे से रूबरू कराया है। इस त्रासदी में सैकड़ों लोगों की जान गई और हजारों लापता हो गए। विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि यह आपदा ग्लेशियर के ढहने और उससे बनी अस्थिर प्राकृतिक झील के फटने के कारण हुई। यह घटना केवल एक स्थानीय आपदा नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु संकट का एक स्पष्ट संकेत है।

ग्लेशियल झीलें तब बनती हैं जब पिघलते ग्लेशियरों का पानी मोरेन (बर्फ और मलबे के ढेर) के पीछे जमा हो जाता है। ये प्राकृतिक बांध मानव निर्मित कंक्रीट के बांधों की तरह मजबूत नहीं होते। जब भारी बारिश, भूकंप या ग्लेशियर का कोई बड़ा हिस्सा इन झीलों में गिरता है, तो यह अस्थिर बांध टूट जाता है और अचानक लाखों गैलन पानी घाटी की ओर बह निकलता है, जो अपने रास्ते में आने वाले हर गांव और शहर को तबाह कर देता है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows कि यह संकट अब केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि एक गंभीर मानवीय और आर्थिक चुनौती बन चुका है। जैसे-जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है, लोग उन घाटियों में बस रहे हैं जो ऐतिहासिक रूप से GLOF के लिए संवेदनशील रही हैं। यदि समय रहते प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems) और बुनियादी ढांचे का विकास नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में जनहानि का आंकड़ा भयावह हो सकता है।

"ग्लेशियरों का पिघलना केवल समुद्र के स्तर को नहीं बढ़ा रहा, बल्कि यह पहाड़ों में 'टाइम बम' जैसी अस्थिर झीलों का निर्माण कर रहा है जो किसी भी क्षण फट सकती हैं।"

ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो विएना विश्वविद्यालय के अनुसार, साल 850 से 2022 के बीच 27 देशों में 3,151 ऐसी घटनाएं दर्ज की गई हैं। सबसे अधिक प्रभाव उत्तरी अमेरिका और मध्य एशिया में देखा गया है। 20वीं सदी की शुरुआत में जहां प्रति वर्ष औसतन 7.6 घटनाएं होती थीं, वहीं 2010 के दशक तक यह संख्या बढ़कर 43.7 हो गई है, जो खतरे की आवृत्ति में छह गुना वृद्धि को दर्शाता है।

क्षेत्र संवेदनशीलता स्तर प्रमुख जोखिम वाले देश
मध्य एशिया (हिमालय) अत्यधिक उच्च भारत, नेपाल, चीन, पाकिस्तान
दक्षिण अमेरिका (एंडीज) उच्च पेरू, बोलीविया, चिली, अर्जेंटीना
यूरोप (आल्प्स) मध्यम-उच्च स्विट्जरलैंड, इटली, फ्रांस, ऑस्ट्रिया

विशेषज्ञों का कहना है कि पेरू जैसे देशों ने जोखिम कम करने के उपायों में निवेश किया है, जिससे मौतों की संख्या में कमी आई है। वहीं, हिमालयी क्षेत्र में अभी भी व्यापक स्तर पर निगरानी और आपदा प्रबंधन की आवश्यकता है। मानव-जनित जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है, जिससे 21वीं सदी के पहले ढाई दशक में ग्लेशियरों के पीछे हटने की दर दोगुनी हो गई है।

Did You Know?: 1941 में पेरू के हुआराज शहर में हुई एक GLOF घटना में 1800 से अधिक लोग मारे गए थे, जो इतिहास की सबसे घातक ग्लेशियल बाढ़ों में से एक मानी जाती है।

Frequently Asked Questions

1. GLOF क्या है और यह सामान्य बाढ़ से कैसे अलग है?
GLOF का अर्थ है 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड'। यह तब होता है जब ग्लेशियर के पिघलने से बनी प्राकृतिक झील का बांध टूट जाता है, जिससे अचानक और तीव्र वेग से पानी नीचे की बस्तियों में आता है। यह सामान्य बारिश वाली बाढ़ की तुलना में अधिक विनाशकारी होती है।

2. क्या हिमालयी क्षेत्र सबसे अधिक जोखिम में है?
हाँ, मध्य एशिया और विशेषकर हिमालयी क्षेत्र दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक हैं क्योंकि यहाँ बर्फ के नुकसान की दर बहुत अधिक है और घनी आबादी वाले क्षेत्र इन झीलों के नीचे स्थित हैं।