कल्लाकुरिची की एक पूर्व शेरिस्तदार सहायक को मोटर दुर्घटना दावा निधि के गबन के लिए 37 साल की सजा सुनाई गई है। आरोपी ने न्यायिक हस्ताक्षरों में जालसाजी कर करोड़ों रुपये अपने बेटे और सहयोगियों के खातों में भेजे थे।
- पूर्व शेरिस्तदार सहायक अरिवुसेल्वी को कोर्ट फंड के गबन के लिए 37 साल की सजा।
- घोटाले में मोटर दुर्घटना दावा (MCOP) फंड को परिवार और सहयोगियों के खातों में डायवर्ट किया गया।
- मद्रास उच्च न्यायालय की स्वतः संज्ञान याचिका के बाद इस घोटाले का खुलासा हुआ।
- कुल गबन की राशि लगभग ₹38 लाख पाई गई।
कल्लाकुरिची की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कोर्ट की पूर्व शेरिस्तदार सहायक को 37 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। दोषी अरिवुसेल्वी को मोटर दुर्घटना पीड़ितों के लिए निर्धारित फंड का गबन करने, न्यायिक अधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर करने और अपराध को छिपाने के लिए अदालती रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ करने का दोषी पाया गया।
यह जटिल धोखाधड़ी तब सामने आई जब तत्कालीन प्रधान अधीनस्थ न्यायाधीश सुरेशकुमार ने रिकॉर्ड का निरीक्षण किया। यह निरीक्षण 2021 में मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा दायर एक स्वतः संज्ञान (suo motu) रिट याचिका के निर्देशों के बाद किया गया था। 2012 और 2014 के बीच निपटाए गए MCOP मामलों की जांच के दौरान, न्यायाधीश ने कुछ हस्ताक्षरों को संदिग्ध पाया, जिससे जांच की दिशा बदल गई।
रिकॉर्ड के सत्यापन से पता चला कि मुआवजे की राशि उन लोगों को वितरित की गई थी जिनका संबंधित मामलों से कोई लेना-देना नहीं था। प्रधान अधीनस्थ न्यायाधीश की शिकायत के बाद, CB-CID, विल्लुपुरम ने 18 दिसंबर, 2021 को विश्वासघात, धोखाधड़ी, जालसाजी, साजिश और खातों के मिथ्याकरण की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला न्यायिक फंड के प्रशासनिक प्रबंधन में एक गंभीर खामी को उजागर करता है। जब निचले स्तर के कर्मचारियों के पास फंड वितरण का अनियंत्रित अधिकार होता है, तो पूरी न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है। यह सजा एक सख्त चेतावनी है कि विश्वास के पदों का उपयोग निजी लाभ के लिए नहीं किया जा सकता।
जांचकर्ताओं ने पाया कि अरिवुसेल्वी ने धोखाधड़ी के लिए एक सोची-समझी रणनीति अपनाई थी। उसने उन केस नंबरों का दोबारा उपयोग किया जो पहले ही बंद हो चुके थे, और इस तरह कोर्ट के फंड को अपने बेटे वरधराजन और सहयोगियों तमिलारसन और सेन्थिलकुमार के बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिया। इस चोरी को छिपाने के लिए उसने कोर्ट के चेक पर सब-जजों के फर्जी हस्ताक्षर किए।
बंद हो चुके केस नंबरों का दोबारा उपयोग करना यह दर्शाता है कि यह केवल एक लिपिकीय त्रुटि नहीं, बल्कि ऑडिट सिस्टम को चकमा देने के लिए किया गया एक सुनियोजित वित्तीय अपराध था।
शुरुआती जांच में ₹28 लाख के गबन का पता चला था, लेकिन गहन जांच के बाद ₹10 लाख की और हेराफेरी सामने आई। फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने पुष्टि की कि रिकॉर्ड में किए गए बदलाव और विवादित हस्ताक्षर अरिवुसेल्वी के ही थे। CB-CID ने इस मामले में 61 गवाहों का परीक्षण किया और 133 दस्तावेजी सबूत पेश किए।
| दोषी | भूमिका | सजा | जुर्माना |
|---|---|---|---|
| अरिवुसेल्वी | मुख्य आरोपी (कर्मचारी) | 37 वर्ष | ₹30,000 |
| वरधराजन | बेटा/सहयोगी | 27 वर्ष | ₹17,000 |
| तमिलारसन | सहयोगी | 27 वर्ष | ₹17,000 |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: इस घोटाले का पता कैसे चला?
उत्तर: मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर जब रिकॉर्ड का निरीक्षण किया गया, तब बंद केसों में संदिग्ध हस्ताक्षर पाए गए, जिससे यह घोटाला खुला।
प्रश्न: कोर्ट कर्मचारी के अलावा और किसे सजा मिली?
उत्तर: उसके बेटे वरधराजन और सहयोगी तमिलारसन दोनों को 27-27 साल की जेल की सजा सुनाई गई है।