मद्रास उच्च न्यायालय ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में पूर्व डीएमके मंत्री पुलवर सेंगुट्टुवन के बच्चों और भतीजी की दोषसिद्धि और तीन साल के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है।

  • मद्रास उच्च न्यायालय ने पूर्व मंत्री के परिजनों की अपील खारिज की।
  • 1996-2001 के बीच ₹81.42 लाख की आय से अधिक संपत्ति का मामला।
  • चार दोषियों को तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

चेन्नई: मद्रास उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए पूर्व डीएमके मंत्री पुलवर बी.एम. सेंगुट्टुवन के परिजनों की दोषसिद्धि और तीन साल के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस जी.के. इलंतरायण ने उन चार दोषियों द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया, जिन्होंने तिरुचिरापल्ली प्रधान जिला और सत्र न्यायालय के 2023 के फैसले को चुनौती दी थी।

दोषियों में सेंगुट्टुवन के दो बेटे, एस. पनीरसेल्वम (60) और एस. शक्तिवेल (58), बेटी आर. मीनाक्षी (52) और भतीजी पी. वल्ली (49) शामिल हैं। यह मामला 1996 से 2001 के बीच अर्जित की गई आय से अधिक संपत्ति से संबंधित है। चूंकि यह मामला एक पूर्व विधायक से जुड़ा था, इसलिए इसे मदुरै बेंच से स्थानांतरित कर चेन्नई की मुख्य पीठ में लाया गया था।

मामले की विस्तृत पृष्ठभूमि

पुलवर बी.एम. सेंगुट्टुवन ने 1996 और 2001 के बीच पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के मंत्रिमंडल में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती तथा पशुपालन विभागों के मंत्री के रूप में कार्य किया था। 2003 में, सतर्कता और भ्रष्टाचार विरोधी निदेशालय (DVAC) ने उनके और उनके परिवार के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 13 मई 1996 को मंत्री के पास केवल ₹3.63 लाख की संपत्ति थी, लेकिन उनके कार्यकाल के अंत तक (14 मई 2001), यह राशि बढ़कर ₹1.01 करोड़ हो गई। इस अवधि के दौरान उन्होंने अपने और अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर जमीन, भवन, ट्रक, कार और दोपहिया वाहन खरीदे।

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि राजनीतिक प्रभाव के बावजूद, भ्रष्टाचार के मामलों में कानूनी प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन अंततः जवाबदेही तय होती है। यह मामला दर्शाता है कि कैसे 'बेनामी' संपत्तियां और परिवार के सदस्यों के नाम पर की गई खरीदारी को जांच एजेंसियां सफलतापूर्वक ट्रैक कर सकती हैं।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत ऐसे फैसले भविष्य के लोक सेवकों के लिए एक कड़ा संदेश हैं कि संपत्ति का विवरण पारदर्शी होना अनिवार्य है।

जांच में पाया गया कि आरोपी ₹49.81 लाख की आय और ₹33.57 लाख के खर्च का विवरण दे सके, लेकिन ₹81.42 लाख की संपत्ति का कोई वैध स्रोत नहीं बता पाए। पूर्व मंत्री और उनके दामाद की मृत्यु के कारण उनके खिलाफ मामला समाप्त हो गया था, लेकिन शेष चार सदस्यों को दोषी ठहराया गया।

क्या आप जानते हैं?: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भारत में लोक सेवकों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार को रोकने और दंडित करने के लिए बनाया गया एक विशेष कानून है।
विवरण1996 (शुरुआत)2001 (अंत)
कुल संपत्ति का मूल्य₹3.63 लाख₹1.01 करोड़
अस्पष्ट राशि (Disproportionate)-₹81.42 लाख

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. इस मामले में कुल कितने लोगों को सजा हुई?
कुल चार लोगों (दो बेटे, एक बेटी और एक भतीजी) को तीन साल की सजा सुनाई गई है।

2. मामला किन वर्षों के बीच की संपत्ति से संबंधित है?
यह मामला 1996 से 2001 के बीच अर्जित संपत्ति से संबंधित है।