इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में हुए एक कथित मुठभेड़ की जांच CBI को सौंप दी है। अदालत ने पुलिस के दावों पर संदेह जताते हुए कहा कि पुलिस अक्सर अपराधियों को केवल पैर में गोली मारकर 'मुठभेड़' का नाटक करती है।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रावस्ती में हुए मई 2025 के मुठभेड़ मामले में CBI जांच के आदेश दिए हैं।
- अदालत ने पुलिस के इस दावे पर सवाल उठाए कि अपराधी ने फायरिंग की, लेकिन पुलिसकर्मी सुरक्षित रहे।
- न्यायाधीश ने पुलिस की 'शूटिंग स्किल' और एक ही वाहन में 13 पुलिसकर्मियों के बैठने की कहानी को संदिग्ध बताया।
- मुठभेड़ के दौरान घायल आरोपी के 'इकबालिया बयान' की वैधता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में मई 2025 में हुई एक कथित मुठभेड़ की जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को निर्देश दिया है। अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए टिप्पणी की कि पुलिस अक्सर अपराधियों को पकड़ते समय ऐसी मुठभेड़ की कहानी रचती है जिसमें अपराधी को केवल घुटने या पैर के नीचे गोली लगती है, जबकि पुलिसकर्मी पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की अदालत इस मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक 36 वर्षीय बलात्कार के आरोपी पर पुलिस ने हमला करने का आरोप लगाया था। अदालत ने पाया कि पुलिस द्वारा प्रस्तुत घटनाक्रम में कई गंभीर खामियां हैं। विशेष रूप से, पुलिस का यह दावा कि 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में सवार थे, अदालत की नजर में अविश्वसनीय और गैर-कानूनी प्रतीत होता है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि यह मामला उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों की बढ़ती प्रवृत्ति और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जवाबदेही के बीच के संघर्ष को उजागर करता है। यदि पुलिस बिना किसी जांच के मुठभेड़ के नाम पर अपराधियों को निशाना बनाती है, तो यह न्यायिक प्रक्रिया और मानवाधिकारों के लिए एक बड़ा खतरा है।
'दिन-ब-दिन... जब भी पुलिस किसी व्यक्ति को पकड़ती है, तो अक्सर एक नई प्राथमिकी दर्ज की जाती है जिसमें आरोप लगाया जाता है कि आरोपी ने पुलिस टीम पर अंधाधुंध फायरिंग की। सामान्यतः, एक गोली भी पुलिसकर्मी की वर्दी को नहीं छूती और वे बिना चोट के बच निकलते हैं।'
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए SHO अश्विनी कुमार दुबे की 'शूटिंग क्षमता' की भी जांच करने का निर्देश दिया है। SHO ने दावा किया था कि उन्होंने रात के अंधेरे में 15 मीटर की दूरी से आत्मरक्षा में दो गोलियां चलाईं, जो सीधे आरोपी के दोनों पैरों में लगीं। न्यायाधीश ने इस बात पर सवाल उठाया कि क्या कोई अधिकारी रात के समय इतनी सटीकता से निशाना लगा सकता है।
आरोपी का आपराधिक इतिहास काफी जटिल रहा है। वह पहले भी यौन शोषण के मामलों में संलिप्त रहा है। हालांकि, इस मामले में भी अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने 'अत्यधिक जल्दबाजी' में सजा सुनाई, जिससे आरोपी को अपना बचाव करने का उचित अवसर नहीं मिल सका।
Frequently Asked Questions
1. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया है?
कोर्ट ने श्रावस्ती मुठभेड़ मामले की जांच CBI को सौंपने और निचली अदालत को आरोपी की डिस्चार्ज एप्लीकेशन पर नए सिरे से विचार करने का आदेश दिया है।
2. पुलिस पर क्या आरोप हैं?
पुलिस पर आरोप है कि उन्होंने मुठभेड़ की कहानी गढ़ने के लिए झूठी FIR दर्ज की और आरोपी को निशाना बनाया।