दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को विनियमित करने का निर्णय केंद्र सरकार के नीतिगत दायरे में आता है।

  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाली याचिका को खारिज किया।
  • अदालत ने कहा कि यह मामला सरकार की नीति निर्धारण शक्ति का है।
  • याचिका में 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सख्त प्रतिबंध की मांग की गई थी।
  • मेटा (Meta) ने बताया कि उन्होंने लाखों आपत्तिजनक पोस्ट हटाए हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया कि बच्चों के सोशल मीडिया तक पहुंच को प्रतिबंधित या विनियमित करना पूरी तरह से केंद्र सरकार के नीति-निर्माण के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत पी. एस. अरोड़ा की पीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) को सुनने से इनकार कर दिया, जिसमें बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग को सीमित करने की मांग की गई थी।

अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, "उनके (सरकार के) विचारों को लिया जाना चाहिए और फिर यह एक नीति का मामला बन जाता है। यह अदालत का काम नहीं है कि वह निर्देश दे कि आपको इसे या उसे प्रतिबंधित करना चाहिए। उन्हें इस पर विचार करने दें और फिर आदेश पारित करने दें।" अदालत ने केंद्र सरकार को इस मामले को एक प्रतिवेदन (representation) के रूप में देखने और इस पर निर्णय लेने का सुझाव दिया है।

क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि डिजिटल युग में बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। यह मामला न केवल कानूनी सीमाओं को परिभाषित करता है, बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि तकनीकी विनियमन के लिए विधायी ढांचे की आवश्यकता है।

याचिकाकर्ता, श्रीमती कीर्ति दुआ और एक बाल रोग विशेषज्ञ द्वारा दायर इस याचिका में तर्क दिया गया कि सोशल मीडिया पर अत्यधिक 'एडिक्टिव' (लत लगाने वाला) कंटेंट बच्चों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। याचिका में मांग की गई थी कि 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सख्त नियम बनाए जाएं और 13 से 16 वर्ष के बच्चों के लिए सामग्री को विनियमित किया जाए।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) की उपस्थिति एक वैश्विक संकट है जिसे केवल सख्त कानून और तकनीकी सुरक्षा के माध्यम से ही नियंत्रित किया जा सकता है।

कानूनी बहस के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने भारत में नाबालिगों के लिए एक मजबूत डिजिटल आईडी प्रणाली की कमी और कमजोर माता-पिता की सहमति तंत्र (parental consent mechanisms) पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने विशेष रूप से बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के प्रसार का मुद्दा उठाया।

दूसरी ओर, मेटा प्लेटफॉर्म्स (Meta Platforms) के वकील ने अदालत को आश्वासन दिया कि कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर CSAM को नियंत्रित करने के लिए सक्रिय कदम उठा रही है। उन्होंने जानकारी दी कि पिछले वर्ष फेसबुक पर छह लाख से अधिक और इंस्टाग्राम पर दो लाख से अधिक ऐसी पोस्ट हटाई गईं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

वैश्विक स्तर पर, कई देशों ने किशोरों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर कड़े नियम लागू किए हैं। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर कड़े कानून प्रस्तावित किए गए हैं। भारत में भी, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियमों के माध्यम से डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करने के प्रयास निरंतर जारी हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या दिल्ली हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया बैन करने का आदेश दिया है?
नहीं, कोर्ट ने कहा है कि यह निर्णय लेने का अधिकार केंद्र सरकार का है।

2. याचिका में क्या मांग की गई थी?
याचिका में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और 13-16 साल के बच्चों के लिए सामग्री विनियमन की मांग की गई थी।

Did You Know?: सोशल मीडिया पर 'डोपामाइन लूप' के कारण बच्चों में लत लगने की संभावना वयस्कों की तुलना में अधिक होती है।