केरल उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि एमबीबीएस प्रथम पेशेवर परीक्षा को पास करने के लिए निर्धारित चार प्रयासों की सीमा में नियमित और सप्लीमेंट्री दोनों परीक्षाएं शामिल होंगी। अदालत ने कहा कि चिकित्सा शिक्षा के मानकों के साथ समझौता नहीं किया जा सकता क्योंकि यह सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

  • MBBS प्रथम पेशेवर परीक्षा के लिए अधिकतम चार प्रयासों की अनुमति है।
  • इन चार प्रयासों में नियमित (Regular) और सप्लीमेंट्री (Supplementary) दोनों परीक्षाएं शामिल हैं।
  • न्यायालय ने शैक्षणिक निकायों के नियमों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
  • यह निर्णय सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

केरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि एमबीबीएस (MBBS) के प्रथम पेशेवर डिग्री परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए निर्धारित 'चार वर्षों के भीतर चार प्रयासों' के नियम में नियमित और सप्लीमेंट्री दोनों तरह की परीक्षाएं शामिल होंगी। न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस ने अपने फैसले में कहा कि एक उम्मीदवार केवल चार प्रयासों का ही लाभ उठा सकता है, चाहे वे नियमित हों या सप्लीमेंट्री, और इन प्रयासों के पूरा होने के बाद कोई अतिरिक्त अवसर नहीं दिया जा सकता।

यह निर्णय ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशन, 2023 और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों पर आधारित है। अदालत ने तर्क दिया कि शैक्षणिक निकायों द्वारा बनाए गए नियमों में बिना किसी ठोस कारण के न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए, विशेष रूप से तब जब मामला चिकित्सा छात्रों से जुड़ा हो।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। चिकित्सा क्षेत्र में छात्रों की दक्षता सीधे तौर पर समाज के स्वास्थ्य और सुरक्षा को प्रभावित करती है। यदि नियमों में ढील दी जाती है, तो इससे भविष्य में चिकित्सा मानकों के साथ समझौता होने का जोखिम बढ़ सकता है।

चिकित्सा शिक्षा के कड़े मानक समाज की सुरक्षा की पहली पंक्ति हैं, और नियमों का उल्लंघन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।

इस मामले की जड़ में कोल्लम की एक प्रथम वर्ष की मेडिकल छात्रा थी, जिसने तर्क दिया था कि चार प्रयासों की सीमा केवल नियमित परीक्षाओं के लिए होनी चाहिए और इसमें सप्लीमेंट्री परीक्षाएं शामिल नहीं होनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने अपनी तीन विषयों में विफलता के बाद 'मर्सी चांस' (दया का अवसर) की मांग की थी।

हालांकि, केरल विश्वविद्यालय स्वास्थ्य विज्ञान, UGC और NMC ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। NMC के दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि कोई छात्र प्रथम चरण की परीक्षा में सप्लीमेंट्री परीक्षा में भी विफल रहता है, तो उसे जूनियर बैच में भेज दिया जाता है और कोई अतिरिक्त सप्लीमेंट्री बैच नहीं दिया जाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

चिकित्सा शिक्षा में 'प्रयासों की सीमा' (Attempt Cap) का नियम दशकों से चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वही छात्र डॉक्टर बनने की राह पर आगे बढ़ें जो आवश्यक शैक्षणिक योग्यता और कौशल प्रदर्शित करते हैं।

Did You Know?: नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) भारत में चिकित्सा शिक्षा के मानक निर्धारित करने वाली सर्वोच्च संस्था है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या सप्लीमेंट्री परीक्षा को एक प्रयास माना जाएगा?
हाँ, न्यायालय के अनुसार नियमित और सप्लीमेंट्री दोनों ही चार प्रयासों की गिनती में शामिल होंगे।

प्रश्न 2: यदि कोई छात्र चार प्रयासों के बाद भी विफल रहता है तो क्या होगा?
नियमों के अनुसार, चार प्रयासों के बाद छात्र को आगे परीक्षा देने का कोई और अवसर नहीं दिया जाएगा।