कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पूर्व भाजपा विधायक सुभाष गुट्टेदार की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें 2023 के आलांद 'वोट चोरी' मामले में उनके खिलाफ आरोप पत्र (chargesheet) को रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने अब उन्हें ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का निर्देश दिया है।
- कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पूर्व भाजपा विधायक सुभाष गुट्टेदार की चार्जशीट रद्द करने की याचिका खारिज की।
- मामला 2023 विधानसभा चुनावों से पहले 5,994 मतदाताओं को अवैध रूप से हटाने की साजिश से जुड़ा है।
- जांच में पश्चिम बंगाल के एक ओटीपी-बायपास प्लेटफॉर्म और डेटा सेंटर के इस्तेमाल का खुलासा हुआ है।
एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ में, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मंगलवार को पूर्व भाजपा विधायक सुभाष गुट्टेदार, उनके बेटे हरशनंद और निजी सचिव थिप्परुद्र की याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने 2023 के आलांद 'वोट चोरी' मामले में सीआईडी (CID) द्वारा दायर आरोप पत्र को रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी डिस्चार्ज के लिए ट्रायल कोर्ट जा सकते हैं और यदि वहां से राहत नहीं मिलती है, तब वे पुनः हाईकोर्ट आ सकते हैं।
इस फैसले के बाद, बेंगलुरु की विशेष अदालत, जो निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ मामलों की सुनवाई करती है, ने 16 सितंबर की तारीख आरोप तय करने (charge framing) के लिए निर्धारित की है। विशेष अदालत ने अप्रैल में ही सीआईडी की चार्जशीट पर संज्ञान ले लिया था।
साजिश का तरीका: कैसे हुई 'वोट चोरी'?
एसआईटी (SIT) की चार्जशीट के अनुसार, गुट्टेदार और उनके सहयोगियों ने उन मतदाताओं की सूची तैयार की जिनके बारे में संदेह था कि वे भाजपा को वोट नहीं देंगे। यह सूची कलबुर्गी स्थित एक डेटा सेंटर को भेजी गई, जिसे अकरम पाशा, असलम पाशा और मोहम्मद अशफाक चलाते थे। आरोप है कि प्रति डिलीशन अनुरोध के लिए उन्हें 80 रुपये का भुगतान किया गया था।
चुनाव आयोग (ECI) के पोर्टल की सुरक्षा को भेदने के लिए, पश्चिम बंगाल के 27 वर्षीय बापी आद्या की मदद ली गई। आद्या 'OTPbazaar' नामक प्लेटफॉर्म चलाता था, जो अमेरिका स्थित 'SMSAlert' साइट से जुड़ा था। इस सिस्टम ने 17 राज्यों के 72 फोन नंबरों का उपयोग करके ओटीपी उत्पन्न किए, जिससे पोर्टल की सुरक्षा को बायपास किया गया। आद्या को नवंबर 2025 में पश्चिम बंगाल के नादिया जिले से गिरफ्तार किया गया था।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल एक स्थानीय चुनावी विवाद नहीं है, बल्कि यह हमारे डिजिटल लोकतांत्रिक ढांचे की गंभीर खामियों को उजागर करता है। राजनीतिक लाभ के लिए साइबर अपराध और ओटीपी-बायपास सेवाओं का उपयोग यह दर्शाता है कि कैसे तकनीक का दुरुपयोग करके चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश की जा सकती है।
आलांद मामला इस बात का प्रमाण है कि डिजिटल वोटर लिस्ट कितनी संवेदनशील हो सकती है और अब समय आ गया है कि मतदाता प्रबंधन में बायोमेट्रिक सत्यापन को अनिवार्य किया जाए।
इस घोटाले का खुलासा फरवरी 2023 में हुआ जब कांग्रेस उम्मीदवार बी आर पाटिल के समर्थकों ने देखा कि जीवित निवासियों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा रहे हैं। 254 मतदान केंद्रों के भौतिक सत्यापन में पाया गया कि 6,018 अनुरोधों में से 5,994 मतदाता वास्तव में आलांद के निवासी थे। इसके अलावा, पुलिस ने आरोप लगाया कि अक्टूबर 2025 में छापेमारी के दौरान गुट्टेदार ने सबूत मिटाने के लिए दस्तावेज जला दिए, जिसे विधायक ने 'दशहरा सफाई' बताया।
| विशेषता | 2025 से पहले की प्रणाली | सितंबर 2025 के बाद का अपडेट |
|---|---|---|
| प्रमाणीकरण | साधारण ओटीपी | पहचान-सत्यापित ओटीपी |
| कमजोरी | ओटीपी-बायपास सेवाओं के प्रति संवेदनशील | थर्ड-पार्टी टूल्स के खिलाफ मजबूत सुरक्षा |
| सत्यापन | डिजिटल-केंद्रित | सख्त पहचान-लिंक्ड सत्यापन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: सुभाष गुट्टेदार कौन हैं?
सुभाष गुट्टेदार आलांद निर्वाचन क्षेत्र से चार बार के पूर्व विधायक हैं, जिन्होंने 2018 में केवल 697 वोटों से जीत दर्ज की थी, लेकिन 2023 में बी आर पाटिल से हार गए।
प्रश्न 2: ओटीपी बायपास कैसे किया गया?
आरोपियों ने 'OTPbazaar' सेवा का उपयोग किया, जिसने 17 राज्यों के 72 अलग-अलग फोन नंबरों के माध्यम से फर्जी ओटीपी जेनरेट करके चुनाव आयोग के पोर्टल को धोखा दिया।