केम्पेगौड़ा ने अपने 2.5 एकड़ की जमीन को प्राकृतिक एवं एकीकृत खेती में बदलकर स्थिर आय हासिल की है। उनकी मॉडल को मंड्या ज़िला पंचायत ने जलवायु‑रेज़िलिएंट कृषि के रूप में सराहा।
मुख्य बिंदु
- 2.5 एकड़ पर प्राकृतिक एवं एकीकृत खेती
- खुशी ऑर्गेनिक्स के माध्यम से सीधे बिक्री
- क्लाइमेट‑रेज़िलिएंट मॉडल को सरकार ने सराहा
मंद्या के किसान केम्पेगौड़ा ने पिछले दस सालों में अपनी 2.5 एकड़ की जमीन को प्राकृतिक और एकीकृत खेती के मॉडल में बदल दिया है। पेड, गन्ना, पत्तागोभी, विभिन्न सब्जियां और फलों की विविधता के साथ उन्होंने फसल विविधीकरण, मूल्य वर्धन और सीधे विपणन के माध्यम से स्थिर आय सुनिश्चित की है।
उनका अपना "खुशी ऑर्गेनिक्स" आउटलेट और मंड्या शहर में हर बुधवार व रविवार आयोजित होने वाला ऑर्गेनिक किसान बाजार, उनके उत्पादों को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुँचाता है। इससे न केवल मध्यस्थों की भूमिका घटती है, बल्कि मूल्य भी किसानों के पक्ष में रहता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कर्नाटक में प्राकृतिक खेती की जड़ें 1970 के दशक में पाई जाती हैं, जब स्थानीय किसान जैविक विधियों को अपनाने लगे। पिछले दो दशकों में राज्य सरकार ने जलवायु‑सुरक्षित कृषि को प्रोत्साहन देने हेतु कई योजनाएं शुरू की हैं, जिससे केम्पेगौड़ा जैसे मॉडल का उदय संभव हुआ।
क्यों यह महत्वपूर्ण है
BozokMedia analysis shows that models like Kempegowda’s provide a replicable blueprint for smallholder farmers facing erratic rainfall and drought, ensuring food security and rural livelihoods.
"विविध फसलें और कम जल‑सघनता वाली खेती ही भविष्य की स्थिरता की कुंजी है," कृषि विशेषज्ञ डॉ. रागवीर सिंह ने कहा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या प्राकृतिक खेती से आमदनी में कमी आती है?
उत्तर: केम्पेगौड़ा के अनुभव से पता चलता है कि मूल्य वर्धन और सीधे बिक्री से आय में वृद्धि संभव है।
प्रश्न 2: कौन सी फसलें कम जल‑सघनता वाली हैं?
उत्तर: मूली, पालक, मेथी और फेनुग्रीक जैसी फसलें कम पानी में अच्छी पैदावार देती हैं।