न्यायिक नियुक्तियों की वर्तमान प्रक्रिया पर उठते सवालों ने पारदर्शिता की बहस को फिर से जीवंत कर दिया है। विशेषज्ञों का तर्क है कि न्यायपालिका को केवल विश्वास के आधार पर नहीं, बल्कि जवाबदेही के आधार पर काम करना चाहिए।

  • कलीजिएम प्रणाली में पारदर्शिता की कमी पर सुप्रीम कोर्ट के भीतर से ही सवाल उठ रहे हैं।
  • न्यायिक नियुक्तियों में 'रिश्तेदारी' (Uncle Judges) को लेकर गंभीर आरोप और डेटा सामने आए हैं।
  • पारदर्शिता की कमी संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के विरुद्ध हो सकती है।

भारत में न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भयान के हालिया अवलोकन ने इस बहस को हवा दी है कि यदि कलीजिएम प्रक्रिया में अधिक खुलापन लाया जाए, तो इससे न केवल सार्वजनिक विश्वास बढ़ेगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित होगा कि नियुक्तियां केवल योग्यता के आधार पर हों।

कलीजिएम प्रणाली का इतिहास और वर्तमान स्थिति: कलीजिएम कोई संवैधानिक निकाय नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा स्वयं निर्मित एक व्यवस्था है। 1981 के 'फर्स्ट जज केस' से लेकर 1998 के 'थर्ड जज केस' तक, न्यायपालिका ने धीरे-धीरे नियुक्तियों में कार्यपालिका के प्रभाव को कम कर स्वयं के नियंत्रण को बढ़ाया। हालांकि, तीन दशक बाद भी यह प्रक्रिया दुनिया के सबसे कम पारदर्शी तंत्रों में से एक बनी हुई है। इसमें रिक्तियों की सूचना, पात्रता मानदंड या चयन की कोई स्पष्ट कार्यप्रणाली सार्वजनिक नहीं की जाती है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि जब न्यायपालिका स्वयं अन्य संस्थानों से पारदर्शिता की मांग करती है, तो उसे अपनी प्रक्रियाओं पर भी उसी स्तर का प्रकाश डालना चाहिए। पारदर्शिता का अभाव न केवल संस्थागत विश्वसनीयता को कम करता है, बल्कि यह नियुक्तियों में पक्षपात की धारणा को भी मजबूत करता है।

न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ संवैधानिक जवाबदेही से मुक्ति नहीं होना चाहिए।

'अंकल जज' और वंशवाद का मुद्दा: गोपनीयता के कारण एक गंभीर आरोप यह भी है कि इस प्रणाली ने 'अंकल जज' संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जहाँ मौजूदा या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के रिश्तेदार आसानी से शीर्ष पदों पर पहुँच जाते हैं। आंकड़ों के अनुसार, 2025 के एक व्यापक मूल्यांकन में पाया गया कि सुप्रीम कोर्ट के लगभग 30% न्यायाधीशों का पूर्व न्यायाधीशों के साथ पारिवारिक संबंध था। यह स्थिति उन प्रथम पीढ़ी के वकीलों के लिए एक बड़ी चुनौती है जिनके पास कोई पारिवारिक प्रभाव नहीं है।

संवैधानिक विरोधाभास: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 सार्वजनिक रोजगार में समानता और अवसर की गारंटी देते हैं। यदि एक क्लर्क या इंजीनियर की भर्ती के लिए पारदर्शी प्रक्रिया आवश्यक है, तो देश की सबसे उच्च संवैधानिक संस्थाओं के लिए अलग मानक क्यों होने चाहिए? विडंबना यह है कि न्यायालय ने स्वयं माना है कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में आता है, लेकिन नियुक्तियों की प्रक्रिया अब भी रहस्यमयी बनी हुई है।

Did You Know?: यूनाइटेड किंगडम में, न्यायिक नियुक्तियां एक सार्वजनिक आयोग द्वारा विज्ञापन और संरचित साक्षात्कार के माध्यम से की जाती हैं।

Frequently Asked Questions

1. कलीजिएम प्रणाली क्या है?
यह भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए वरिष्ठ न्यायाधीशों के एक समूह द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया है।

2. पारदर्शिता की कमी से क्या नुकसान होता है?
इससे नियुक्तियों में योग्यता के बजाय प्रभाव और संबंधों के वर्चस्व का खतरा बढ़ जाता है।