पुणे पोर्श दुर्घटना के पीड़ितों के माता-पिता ने किशोर न्याय कानून (Juvenile Justice Act) में संशोधन की मांग करते हुए नाबालिगों के लिए अपराध की आयु सीमा को 16 वर्ष करने का आह्वान किया है।

  • पीड़ितों के माता-पिता ने किशोर न्याय कानून में संशोधन हेतु सरकार को पत्र लिखा है।
  • नाबालिगों के लिए अपराध की आयु सीमा को 18 से घटाकर 16 वर्ष करने की मांग की गई है।
  • आरोप है कि कानून के दुरुपयोग के कारण नाबालिग अपराधियों को बहुत जल्दी जमानत मिल जाती है।

पुणे के कल्याणी नगर में हुई चर्चित पुणे पोर्श दुर्घटना के दो साल बाद, इस घटना के पीड़ितों के माता-पिता ने एक बार फिर न्याय की गुहार लगाई है। मृतक अनीश अवधिया और अश्विनी कोष्टा के माता-पिता, ओम और सविता अवधिया ने पुणे में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) में बड़े बदलाव की मांग की है।

अवधिया परिवार का तर्क है कि वर्तमान कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। उनका कहना है कि 17 साल के नाबालिग द्वारा की गई घातक दुर्घटना के मामले में, आरोपी को मात्र 15 घंटों के भीतर जमानत मिल गई। उन्होंने मांग की है कि कानून के तहत 'नाबालिग' की आयु सीमा को 18 से घटाकर 16 वर्ष किया जाना चाहिए, ताकि गंभीर अपराधों में शामिल किशोरों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जा सके।

क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मुद्दा केवल एक दुर्घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की कानूनी प्रणाली में एक बड़ी खामी को उजागर करता है। नाबालिगों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का उपयोग अक्सर संगठित अपराध और गंभीर सड़क दुर्घटनाओं में ढाल के रूप में किया जाता है।

'कानून का डर खत्म हो रहा है क्योंकि अपराधी जानते हैं कि नाबालिग होने का कवच उन्हें सजा से बचा लेगा।'

ओम अवधिया ने मुंबई और नागपुर की अन्य हालिया घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि कई माता-पिता अपने नाबालिग बच्चों को महंगी कारें देते हैं, जिससे उनमें कानून के प्रति कोई भय नहीं रहता। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि आपराधिक गिरोह अब नाबालिगों को भर्ती कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कानून उन्हें कठोर सजा से बचाएगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में किशोर न्याय कानून का मुख्य उद्देश्य सुधार और पुनर्वास है, न कि दंड। हालांकि, 2012 के निर्भया मामले जैसे गंभीर अपराधों ने इस बहस को जन्म दिया था कि क्या अत्यधिक गंभीर अपराधों के लिए किशोरों को भी वयस्क की तरह माना जाना चाहिए। उस मामले में, सबसे कम उम्र के आरोपी को अधिकतम तीन साल की सजा मिली थी, जबकि अन्य को फांसी दी गई थी।

पुणे पोर्श मामले में, दो साल बीत जाने के बाद भी अभी तक ट्रायल शुरू नहीं हो पाया है। पीड़ितों के परिवारों का कहना है कि फास्ट-ट्रैक कोर्ट का आश्वासन मिलने के बावजूद मामले में अत्यधिक देरी हो रही है, जिससे न्याय की उम्मीदें धुंधली पड़ती जा रही हैं।

क्या आप जानते हैं?: वर्तमान में भारत में किशोर न्याय अधिनियम के तहत 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को 'बच्चा' माना जाता है, जिसका उद्देश्य सजा के बजाय सुधार करना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. पीड़ित परिवार कानून में क्या बदलाव चाहता है?
वे चाहते हैं कि गंभीर अपराधों के लिए किशोर की आयु सीमा 18 से घटाकर 16 वर्ष कर दी जाए।

2. पुणे पोर्श मामले में वर्तमान स्थिति क्या है?
दो साल बाद भी इस मामले का ट्रायल शुरू नहीं हुआ है, जिससे पीड़ित परिवार न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं।