केरल के एक उपभोक्ता आयोग ने कोचिंग संस्थानों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि वे केवल 'पैसा वसूलने वाली मशीन' की तरह काम नहीं कर सकते। एक छात्रा को स्वास्थ्य कारणों से कोर्स बीच में छोड़ने पर संस्थान को रिफंड देने का आदेश दिया गया है।
- कोचिंग संस्थान 'नो-रिफंड' क्लॉज के नाम पर छात्रों का पैसा नहीं रख सकते।
- केरल उपभोक्ता आयोग ने कोचिंग संस्थान को ₹78,000 का भुगतान करने का आदेश दिया।
- कोर्ट ने कहा कि कोचिंग संस्थान केवल 'ईंट और सीमेंट' का ढांचा नहीं हैं, बल्कि सेवा प्रदाता हैं।
तिरुवनंतपुरम, केरल: केरल के एक उपभोक्ता आयोग ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कोचिंग संस्थान किसी छात्र द्वारा बीच में छोड़े गए कोर्स की पूरी फीस नहीं रख सकते। आयोग ने 'नो-रिफंड' (कोई रिफंड नहीं) की नीति को 'अनुचित व्यापार व्यवहार' (Unfair Trade Practice) करार दिया है। यह मामला एक ऐसी छात्रा का था जिसने NEET 2023 की तैयारी के लिए ₹82,600 का भुगतान किया था, लेकिन गंभीर पीठ दर्द के कारण केवल 12 कक्षाएं ही ले सकी।
मामले की सुनवाई करते हुए तिरुवनंतपुरम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष पी.वी. जयराजन और सदस्यों ने कहा कि कोचिंग संस्थान केवल 'पैसा वसूलने वाली मशीन' की तरह काम नहीं कर सकते। आयोग ने टिप्पणी की कि ये संस्थान केवल 'ईंट और सीमेंट' से बने ढांचे नहीं हैं जहाँ छात्र भारी शुल्क देकर आते हैं। यदि कोई छात्र शिक्षण पद्धति या शिक्षकों के व्यवहार से असंतुष्ट है, तो उसे शेष अवधि के लिए रिफंड देने से मना नहीं किया जा सकता।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय भारत में कोचिंग उद्योग के बढ़ते एकाधिकार और छात्रों के शोषण के खिलाफ एक मील का पत्थर साबित होगा। अक्सर कोचिंग संस्थान प्रवेश फॉर्म में ऐसे कठोर नियम शामिल कर देते हैं जिन्हें छात्र या उनके माता-पिता बातचीत (bargaining) के जरिए बदल नहीं पाते। कोर्ट ने इस बात को स्वीकार किया कि छात्रों के पास इन शर्तों को बातचीत के जरिए बदलने की शक्ति नहीं होती, इसलिए इन्हें उनके खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कोचिंग संस्थान केवल सेवा प्रदाता हैं; यदि सेवा नहीं दी गई है, तो वे उस सेवा के लिए शुल्क लेने का अधिकार नहीं रखते।
मामले की पृष्ठभूमि: छात्रा की माँ ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी को गंभीर गर्दन और पीठ दर्द के कारण डॉक्टर ने बेड रेस्ट की सलाह दी थी। छात्रा ने एक बैच छोड़ दिया और दूसरे में शामिल होने की कोशिश की, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और प्रबंधन के उदासीन रवैये के कारण वह पढ़ाई जारी नहीं रख सकी। जब परिवार ने रिफंड मांगा, तो संस्थान ने मना कर दिया, जिसके बाद मामला अदालत पहुंचा।
आयोग ने कोचिंग संस्थान के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि फीस का उपयोग अध्ययन सामग्री और प्रिंटिंग पर खर्च किया जा चुका है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता, चाहे वे अमीर हों या गरीब, अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए कर्ज लेकर भी फीस भरते हैं। रिफंड न मिलना उनके करियर निर्माण के महत्वपूर्ण वर्षों को खतरे में डाल सकता है।
Frequently Asked Questions
1. क्या कोचिंग संस्थान 'नो-रिफंड' नीति का पालन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं?
नहीं, उपभोक्ता आयोग के अनुसार, यदि सेवा पूरी तरह प्रदान नहीं की गई है, तो 'नो-रिफंड' क्लॉज को अनुचित व्यापार व्यवहार माना जा सकता है।
2. इस मामले में कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
कोर्ट ने संस्थान को ₹12,000 की कटौती के बाद ₹70,600 रिफंड करने, ₹5,000 मानसिक पीड़ा के लिए और ₹3,000 कानूनी खर्च के रूप में देने का आदेश दिया।
| विवरण | राशि (₹) |
|---|---|
| कुल भुगतान किया गया शुल्क | 82,600 |
| किए गए अध्ययन/कक्षाओं का शुल्क | 12,000 |
| रिफंड की राशि | 70,600 |
| कुल मुआवजा (मानसिक पीड़ा + कानूनी) | 8,000 |