दिल्ली उच्च न्यायालय ने क्विक लिविंग (Kwick Living) द्वारा चलाए जा रहे एक विज्ञापन अभियान को हटाने का आदेश दिया है, जिसमें हिंदुस्तान यूनिलीवर के उत्पादों को त्वचा के लिए हानिकारक बताया गया था। कोर्ट ने इसे तुलनात्मक विज्ञापन के बजाय 'उत्पाद की छवि खराब करना' माना है।

  • दिल्ली हाई कोर्ट ने क्विक लिविंग को एक सप्ताह के भीतर HUL विरोधी विज्ञापन हटाने का निर्देश दिया।
  • कोर्ट ने 'तुलनात्मक विज्ञापन' और 'उत्पाद की बदनामी' के बीच स्पष्ट अंतर बताया।
  • विज्ञापनों में विम और सर्फ एक्सेल को वैज्ञानिक रूप से असुरक्षित बताया गया था, जिसे कोर्ट ने गलत माना।

उपभोक्ता वस्तुओं की दिग्गज कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) के लिए एक बड़ी कानूनी जीत सामने आई है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन विज्ञापनों पर रोक लगा दी है जिनमें कंपनी के लोकप्रिय ब्रांड्स विम (Vim) और सर्फ एक्सेल (Surf Excel) को त्वचा में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बताया गया था। कोर्ट ने आदेश दिया कि क्विक लिविंग नामक कंपनी इन विज्ञापनों को तुरंत हटाए।

यह पूरा मामला "वॉर ऑन वॉट्स हिडन" (War on What’s Hidden) नामक एक अभियान से जुड़ा है। HUL का तर्क था कि यह अभियान केवल तुलना नहीं था, बल्कि उनके उत्पादों की छवि को जानबूझकर खराब करने की कोशिश थी। विज्ञापनों में जटिल रासायनिक नामों और प्रतिशत का उपयोग किया गया था ताकि आम उपभोक्ताओं को यह विश्वास दिलाया जा सके कि HUL के उत्पाद जोखिम भरे हैं और इनसे एक्जिमा या खुजली जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला भारत के FMCG क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है। यह स्पष्ट करता है कि बाजार में प्रतिस्पर्धा के नाम पर किसी ब्रांड को 'छद्म-विज्ञान' (pseudo-science) के जरिए डराना कानूनी रूप से गलत है। कोर्ट ने माना कि जब विज्ञापन उपभोक्ता के विश्वास को हिलाने और प्रतिद्वंद्वी का मजाक उड़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो वह अभिव्यक्ति की आजादी या व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के दायरे से बाहर हो जाता है।

न्यायमूर्ति अनूप जयराम भाम्भानी ने टिप्पणी की कि एक औसत उपभोक्ता के पास विज्ञापनों में दिए गए जटिल रासायनिक दावों का विश्लेषण करने की विशेषज्ञता नहीं होती। उन्होंने कहा कि विज्ञापन का समग्र संदेश यह था कि HUL के उत्पादों पर वर्षों का भरोसा वास्तव में अज्ञानता पर आधारित था, जो कि उपभोक्ताओं के विश्वास को तोड़ने का एक प्रयास है।

अदालत का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि वैज्ञानिक आंकड़ों का चयनात्मक उपयोग करके किसी प्रतिस्पर्धी ब्रांड की छवि खराब करना कानूनन अपराध है।

HUL की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं अमित सिबल और राजीव नयर ने दलील दी कि यदि कंपनी वास्तव में रसायनों की सुरक्षा को लेकर चिंतित थी, तो वह बाजार के सभी डिटर्जेंट ब्रांडों का विश्लेषण करती, न कि केवल HUL के "100 नींबू की शक्ति" और "दाग अच्छे हैं" जैसे स्लोगन को निशाना बनाती।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह अभियान तुलनात्मक विज्ञापन की सीमाओं को पार कर गया था और इसका उद्देश्य HUL के ग्राहकों को यह महसूस कराना था कि वे इन उत्पादों का उपयोग करके 'मूर्ख' बन रहे हैं।

क्या आप जानते हैं?: भारत में तुलनात्मक विज्ञापन कानूनी हैं, बशर्ते वे तथ्यों पर आधारित हों और किसी अन्य ब्रांड की छवि को अपमानजनक तरीके से खराब न करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. तुलनात्मक विज्ञापन और उत्पाद की बदनामी (Denigration) में क्या अंतर है?
तुलनात्मक विज्ञापन में तथ्यों के आधार पर अपने उत्पाद को बेहतर बताया जाता है, जबकि बदनामी में प्रतिद्वंद्वी के उत्पाद को झूठे दावों के जरिए असुरक्षित या घटिया दिखाया जाता है।

2. इस मामले में HUL के किन उत्पादों को निशाना बनाया गया था?
विज्ञापनों में मुख्य रूप से विम (बर्तन धोने का साबुन) और सर्फ एक्सेल (वॉशिंग पाउडर) को निशाना बनाया गया था।