गौहाटी उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत 'तलाक-ए-हसन' तलाक का एक वैध और स्वीकार्य रूप है, जो इसे प्रतिबंधित तत्काल ट्रिपल तलाक से अलग करता है।
- तलाक-ए-हसन को भारत में तलाक के एक वैध और स्वीकार्य रूप के रूप में मान्यता दी गई है।
- अदालत ने इसे 'तलाक-ए-बिद्दत' (तत्काल ट्रिपल तलाक) से अलग बताया, जिसे असंवैधानिक घोषित किया गया था।
- अदालत ने असम के मुस्लिम विवाह और तलाक अनिवार्य पंजीकरण अधिनियम, 2024 के तहत पंजीकरण के निर्देश दिए हैं।
गौहाटी उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा है कि तलाक-ए-हसन मुसलमानों के बीच तलाक का एक वैध तरीका है और वर्तमान में भारत में प्रतिबंधित नहीं है। न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी ने यह आदेश एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें एक व्यक्ति ने अपने तलाक के औपचारिक पंजीकरण की मांग की थी।
विवादास्पद तत्काल ट्रिपल तलाक के विपरीत, जिसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित किया था, तलाक-ए-हसन एक व्यवस्थित प्रक्रिया है। इसमें तीन अलग-अलग अवसरों पर तलाक की घोषणा की जाती है, जिनमें प्रत्येक के बीच एक महत्वपूर्ण अंतराल होता है, जो आमतौर पर लगभग 90 दिनों या तीन मासिक धर्म चक्रों तक फैला होता है। इस अंतराल का मुख्य उद्देश्य पति-पत्नी के बीच सुलह की संभावना को जीवित रखना है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह फैसला तत्काल ट्रिपल तलाक पर प्रतिबंध के बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ की बारीकियों पर महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है। तलाक-ए-हसन को मान्य करके, अदालत मनमाने तलाक और एक ऐसी प्रक्रिया के बीच अंतर को मजबूत कर रही है जो मध्यस्थता और चिंतन की अनुमति देती है।
"तत्काल तलाक और अंतराल वाले तलाक के बीच कानूनी अंतर व्यक्तिगत कानून के अधिकारों और मनमाने वैवाहिक विघटन की रोकथाम के बीच संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण है।"
अदालत के समक्ष मामले में, याचिकाकर्ता ने बताया कि उसकी शादी 2016 में हुई थी और बाद में पत्नी के साथ मतभेद हो गए। 2018 में पत्नी के घर छोड़ने और सुलह के प्रयास विफल होने के बाद, उसने 22 मार्च, 26 अप्रैल और 27 मई, 2026 को तलाक-ए-हसन की घोषणा की और फिर पंजीकरण के लिए आवेदन किया।
राज्य ने शुरू में बरपेटा प्राधिकरण के माध्यम से पंजीकरण का विरोध किया था, यह तर्क देते हुए कि 1935 का कानून निरस्त कर दिया गया है। न्यायमूर्ति चौधरी ने सहमति जताई कि पुराना प्राधिकरण अब प्रभावी नहीं है, लेकिन याचिकाकर्ता को असम मुस्लिम विवाह और तलाक अनिवार्य पंजीकरण अधिनियम, 2024 के तहत अधिकार क्षेत्र वाले रजिस्ट्रार से संपर्क करने का निर्देश दिया।
अदालत ने रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता की पहचान सत्यापित करे और यह जांचे कि क्या वास्तव में तलाक दिया गया था, इससे पहले कि 2024 अधिनियम की धारा 12 के तहत पंजीकरण पर निर्णय लिया जाए। अदालत ने यह भी नोट किया कि पत्नी, जो नोटिस के बावजूद उपस्थित नहीं हुई, उचित मंच पर इस तलाक को चुनौती देने के लिए स्वतंत्र है।
| विशेषता | तलाक-ए-बिद्दत (तत्काल) | तलाक-ए-हसन (अंतराल) |
|---|---|---|
| समय सीमा | तत्काल/तुरंत | लगभग 90 दिन |
| सुलह का अवसर | कोई नहीं | अधिक (घोषणाओं के बीच) |
| भारत में कानूनी स्थिति | असंवैधानिक/अवैध | वैध/स्वीकार्य |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. क्या भारत में सभी प्रकार के ट्रिपल तलाक प्रतिबंधित हैं?
नहीं, केवल 'तलाक-ए-बिद्दत' (तत्काल ट्रिपल तलाक) प्रतिबंधित है। तलाक-ए-हसन जैसे रूप, जिनमें अंतराल और सुलह के अवसर होते हैं, अभी भी मान्य हैं।
2. असम में अब तलाक का पंजीकरण किस कानून के तहत किया जाता है?
अब यह असम मुस्लिम विवाह और तलाक अनिवार्य पंजीकरण अधिनियम, 2024 के तहत किया जाता है।