इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि राज्य सरकार कठोर गुंडा एक्ट का उपयोग सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के बजाय उत्पीड़न के हथियार के रूप में कर रही है।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जाहिद अली के खिलाफ जिला बदर के आदेश को रद्द किया।
- अदालत ने पाया कि यूपी सरकार गुंडा एक्ट को उत्पीड़न के उपकरण के रूप में उपयोग कर रही है।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस मामले में बरी हो चुका हो, उसे 'गुंडा' घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
- अदालत ने कहा कि बिना FIR के केवल 'बीट सूचना रिपोर्ट' कानूनी रूप से अपर्याप्त है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज्य में गुंडा एक्ट के कथित दुरुपयोग को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार पर कड़ा प्रहार किया है। न्यायालय ने टिप्पणी की है कि उसके सामने आने वाले मामले यह संकेत देते हैं कि राज्य सरकार इस कठोर कानून को उत्पीड़न के एक साधन के रूप में इस्तेमाल करने के लिए दृढ़ संकल्पित प्रतीत होती है।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की लखनऊ पीठ ने कहा कि गुंडा एक्ट एक "बहुत शक्तिशाली" कानून है और इसका उपयोग अत्यंत सावधानी के साथ, केवल स्पष्ट मामलों में और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी गोंडा जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जाहिद अली नामक व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित करने और उसे छह महीने के लिए जिले से निष्कासित (externing) करने के आदेश को रद्द करते हुए की गई।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि निवारक निरोध (preventive detention) और कठोर राज्य कानूनों का दुरुपयोग नागरिक स्वतंत्रता के व्यवस्थित क्षरण का कारण बन सकता है। जब प्रशासनिक अधिकारी किसी नागरिक की आवाजाही को प्रतिबंधित करने के लिए पुराने या बरी किए गए रिकॉर्ड पर भरोसा करते हैं, तो यह सत्यापन प्रक्रिया की विफलता और कार्यकारी विवेक में संभावित पूर्वाग्रह को दर्शाता है।
अदालत ने पाया कि जिला मजिस्ट्रेट ने 2010 के एक मामले पर भरोसा किया था, जबकि याचिकाकर्ता को 2017 में ही उस मामले में बरी किया जा चुका था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस व्यक्ति को पहले ही बरी किया जा चुका हो, उस मामले को बाद में उसे गुंडा घोषित करने के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
गुंडा एक्ट एक बहुत शक्तिशाली कानून है और इसे बहुत सावधानी के साथ, केवल स्पष्ट मामलों में और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए लागू किया जाना चाहिए।
अदालत ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि 2020 के एक आपराधिक मामले और 2026 के निष्कासन आदेश के बीच लगभग छह साल का अंतर था। न्यायालय ने कहा कि इन दोनों के बीच कोई तर्कसंगत संबंध स्थापित नहीं किया जा सका, जिससे यह साबित नहीं होता कि जाहिद अली एक 'अभ्यस्त अपराधी' है।
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट की आलोचना करते हुए कहा कि जिला मजिस्ट्रेट के सामने याचिकाकर्ता की गलत तस्वीर पेश की गई। कोर्ट ने 'बीट सूचना रिपोर्ट' को गुंडा एक्ट लागू करने का वैध आधार मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि उस सूचना के आधार पर कोई मामला दर्ज नहीं किया गया था और न ही जाहिद अली को सुनवाई का अवसर दिया गया था, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
अदालत ने पाया कि मंडल आयुक्त ने भी बरी किए गए मामले को लंबित मामला मान लिया, जो विवेक के प्रयोग में पूरी तरह विफल रहा। अंततः, हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट और आयुक्त दोनों के आदेशों को कानूनी रूप से अस्थिर मानते हुए उन्हें रद्द कर दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. क्या किसी बरी किए गए मामले का उपयोग किसी को गुंडा घोषित करने के लिए किया जा सकता है?
नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट के अनुसार, जिस मामले में व्यक्ति बरी हो चुका हो, उसे गुंडा एक्ट के तहत आधार नहीं बनाया जा सकता।
2. बीट सूचना रिपोर्ट क्या होती है?
यह स्थानीय पुलिस द्वारा खुफिया जानकारी के आधार पर दी गई रिपोर्ट होती है; हालांकि, अदालत ने कहा कि बिना FIR या सुनवाई के इसे निष्कासन का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।