मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने दमोह के एक स्कूल में हिजाब थोपने और जबरन धर्मांतरण के आरोपों से जुड़े मामले में चार आरोपियों की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल हिजाब पहनना अपराध नहीं है, लेकिन जबरदस्ती और दबाव के आरोप विचारण (trial) के दौरान तय होंगे।

  • एमपी हाई कोर्ट ने दमोह हिजाब विवाद में आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल हिजाब पहनना 'एमपी धर्म स्वतंत्रता अधिनियम' के तहत अपराध नहीं है।
  • केस का मुख्य आधार जबरन ड्रेस कोड, तिलक-कलावा पर रोक और धर्मांतरण के आरोप हैं।
  • अदालत ने कहा कि ये आरोप 'बेतुके' नहीं हैं और इनका फैसला ट्रायल कोर्ट में होना चाहिए।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने दमोह के गंगा जमुना हायर सेकेंडरी स्कूल में हिजाब और धार्मिक प्रथाओं को थोपने के आरोपों से जुड़े एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने चार आरोपियों द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने माना कि प्राथमिकी (FIR) में लगाए गए आरोप और जांच के दौरान एकत्र किए गए सबूत इतने बेतुके नहीं हैं कि उन्हें शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया जाए।

सुनवाई के दौरान, जस्टिस जोशी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम के तहत केवल हिजाब पहनना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। अदालत के शब्दों में, "बिना किसी वैधानिक धर्मांतरण के प्रयास या प्रतिबंधित साधनों के उपयोग के, केवल एक विशेष पोशाक पहनना स्वचालित रूप से अपराध नहीं बन जाता।"

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that this ruling is a delicate balancing act between religious freedom and the prevention of forced conversion. By distinguishing between 'wearing a garment' and 'coercing a practice', the court has ensured that while personal choice is protected, institutional pressure for conversion remains under legal scrutiny. This sets a precedent for how similar disputes across India might be handled—shifting the focus from the symbol (hijab) to the intent (coercion).

अदालत ने रेखांकित किया कि अभियोजन पक्ष का मामला केवल हिजाब पहनने तक सीमित नहीं है। आरोपों में यह भी शामिल है कि स्कूल में एक विशिष्ट ड्रेस कोड अनिवार्य किया गया था, छात्रों को तिलक और कलावा पहनने से रोका गया था, और उन्हें कुछ विशेष धार्मिक प्रथाओं और प्रार्थनाओं का पालन करने के लिए मजबूर किया गया था। कोर्ट ने कहा कि क्या ये प्रथाएं वास्तव में अनिवार्य थीं और क्या इसमें धमकी या जबरदस्ती का उपयोग किया गया था, यह केवल साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद ही तय किया जा सकता है।

"जब आरोप केवल प्रतीकों के बारे में न होकर जबरदस्ती और मनोवैज्ञानिक दबाव के बारे में हों, तो न्याय का तकाजा है कि मामले का फैसला ट्रायल के माध्यम से ही हो।"

इस मामले में दो आरोपियों, शैलेंद्र कुमार जैन और अब्दुल वसीम बारी ने तर्क दिया था कि वे संबंधित अवधि के दौरान स्कूल प्रबंधन समिति के सदस्य नहीं थे। हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री उनके प्रभाव और भूमिका की ओर इशारा करती है, जिसका फैसला ट्रायल कोर्ट करेगा। इसके अलावा, कुछ अभिभावकों द्वारा दिए गए हलफनामों को भी इस स्तर पर केस खारिज करने का आधार नहीं माना गया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह विवाद मई 2023 में तब शुरू हुआ जब स्कूल के कक्षा 10 के परिणामों के एक पोस्टर में गैर-मुस्लिम छात्राओं को भी सिर पर स्कार्फ पहने देखा गया। इसके बाद दक्षिणपंथी समूहों ने आरोप लगाया कि हिंदू और जैन छात्रों को जबरन हिजाब पहनने और इस्लामी प्रथाओं का पालन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जून 2023 में प्रिंसिपल अफशा शेख, शिक्षक अनस अथर अली और सुरक्षा गार्ड रुस्तम अली सहित कई लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

क्या आप जानते हैं?: मध्य प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम का मुख्य उद्देश्य किसी भी व्यक्ति को लालच, बल या जबरदस्ती के माध्यम से धर्म परिवर्तन करने से रोकना है।

Frequently Asked Questions

1. क्या हाई कोर्ट ने हिजाब पहनने को अपराध माना है?
नहीं, अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि केवल हिजाब पहनना अपने आप में कोई अपराध नहीं है।

2. इस मामले में मुख्य विवाद क्या है?
मुख्य विवाद हिजाब के अनिवार्य ड्रेस कोड, तिलक-कलावा पर रोक और कथित तौर पर जबरन धर्मांतरण के प्रयासों को लेकर है।