बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आपसी सहमति से बने संबंधों का टूटना आपराधिक मामला नहीं बन सकता। अदालत ने शादी के झूठे वादे के आधार पर एक डॉक्टर के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है।

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति से बने संबंधों का टूटना 'धोखाधड़ी' नहीं है।
  • अदालत ने धारा 69 BNS के तहत दर्ज प्राथमिकी (FIR) को रद्द कर दिया।
  • न्यायालय ने कहा कि आपराधिक कानून का उपयोग व्यक्तिगत विवादों को सुलझाने के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक अवलोकन करते हुए कहा कि "हर रोमांटिक विफलता को धोखे के रूप में नहीं देखा जा सकता" और केवल एक ब्रेकअप के आधार पर आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती। अदालत ने एक 45 वर्षीय डॉक्टर के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया, जिन पर एक 49 वर्षीय विधवा डॉक्टर के साथ शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाने का आरोप था।

कोल्हापुर सर्किट बेंच के जस्टिस अभय जे. मंतरी ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता और याचिकाकर्ता 2000 के दशक की शुरुआत से एक-दूसरे को जानते थे। शिकायतकर्ता का आरोप था कि याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी को तलाक देने और उससे शादी करने के बहाने जनवरी 2019 से जून 2023 तक संबंध बनाए रखे। हालांकि, अदालत ने पाया कि इन आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that this judgment sets a critical precedent in distinguishing between 'breach of promise' and 'fraudulent intent'. In an era where relationship disputes are increasingly criminalized, the court is drawing a firm line to protect individuals from malicious prosecutions following emotional breakups.

"The object of the legislature was to punish deceit and not disappointment."

अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 का विश्लेषण करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष को यह साबित करना आवश्यक है कि शादी का वादा शुरुआत से ही झूठा था। यदि संबंध स्वैच्छिक और सहमति से थे, और उनमें किसी भी प्रकार का दबाव, धोखाधड़ी या गलत बयानी नहीं थी, तो कोई अपराध नहीं बनता।

न्यायालय ने व्हाट्सएप चैट की जांच की, जिससे यह पता चला कि याचिकाकर्ता ने कभी स्पष्ट रूप से शादी का वादा नहीं किया था, बल्कि दोनों ने मिलकर शिकायतकर्ता के लिए अन्य विवाह प्रस्तावों की तलाश की थी। चैट से यह भी संकेत मिला कि शिकायतकर्ता को पता था कि याचिकाकर्ता अपनी पत्नी के साथ रह सकता है, फिर भी वह उसके साथ रहना चाहती थी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात करें तो, भारतीय न्यायालयों ने पिछले कई वर्षों में 'शादी के वादे पर यौन संबंध' के मामलों में अपनी व्याख्या बदली है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फैसलों में कहा है कि यदि एक वयस्क महिला अपनी मर्जी से संबंध बनाती है, तो बाद में शादी न हो पाने पर उसे 'धोखाधड़ी' नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि इरादा शुरू से ही केवल यौन शोषण का था।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 विशेष रूप से 'धोखे से यौन संबंध' बनाने के अपराध को संबोधित करती है, जिसमें शादी का झूठा वादा एक प्रमुख तत्व है।

Frequently Asked Questions

1. क्या हर ब्रेकअप के बाद शादी के वादे का केस किया जा सकता है?
नहीं, अदालत के अनुसार केवल ब्रेकअप आपराधिक मामला नहीं बनता। यह साबित करना होगा कि वादा शुरू से ही झूठा था।

2. BNS की धारा 69 क्या है?
यह धारा शादी के झूठे वादे या धोखे से बनाए गए यौन संबंधों के लिए दंड का प्रावधान करती है।