भारत का ईथनॉल मिश्रण नीति 2013 में शुरू हुई, लेकिन 2014‑2023 में मिश्रण दर 1.5% से 20% तक नहीं बढ़ पाई। केंद्र ने बताया कि E20 की कीमत पेट्रोल से कम नहीं रखी जा सकती, क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय तेल शॉक से आर्थिक सुरक्षा घटेगी।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • E20 की कीमत पेट्रोल से कम नहीं रखी जा सकती
  • नियमित ईथनॉल मिश्रण से वैश्विक तेल कीमतों के झटकों से बचाव
  • सरकारी नीति 2025 तक 20% मिश्रण लक्ष्य निर्धारित

भारत में ईथनॉल (E20) की शुरुआत 2001 के पायलट प्रोजेक्ट से हुई, जबकि 2013 में इसे राष्ट्रीय ऊर्जा नीति में औपचारिक रूप से शामिल किया गया। शुरुआती वर्षों में मिश्रण स्तर केवल 1.5% तक ही रहा, क्योंकि उत्पादन मुख्यतः मौसमी गन्ने की फसल पर निर्भर था।

नीति‑परिवर्तन और आर्थिक तर्क

2022‑2023 में सरकार ने 20% मिश्रण (E20) का लक्ष्य घोषित किया, लेकिन इंधन की कीमत को पेट्रोल से कम नहीं रखा जा सकता इस बात को स्पष्ट किया। इसका मुख्य कारण दो‑स्तरीय टैक्स संरचना है, जहाँ ईथनॉल पर कस्टम ड्यूटी और पेट्रोल पर एक्साईज़ ड्यूटी अलग‑अलग लगती हैं। यदि E20 को सस्ती कीमत पर बेचा गया तो राजस्व में गिरावट आएगी, जिससे सार्वजनिक वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।

अंतरराष्ट्रीय तेल शॉक से सुरक्षा

E20 का प्रमुख लाभ यह है कि यह देश को तेल आयात पर निर्भरता कम करके अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उतार‑चढ़ाव से बचाता है। जब विश्व बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तब ईथनॉल‑आधारित ईंधन अधिक स्थिर लागत प्रदान करता है, जिससे उत्पादन‑उद्योग और परिवहन खर्च में अचानक वृद्धि नहीं होती। यह आर्थिक शील्ड विशेषकर कृषि‑आधारित राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार एवं आय संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।

भविष्य की दिशा और चुनौतियां

सरकार ने अगले दो वर्षों में ईथनॉल उत्पादन क्षमता को 10 मिलियन टन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जिससे 2025 तक 20% मिश्रण लक्ष्य हासिल हो सके। इस दिशा में नई नीतियों में गन्ने‑बाद की बायो‑मास, जौ‑आधारित ईथनॉल, और कचरा‑आधारित बायो‑फ्यूल को भी शामिल किया गया है। फिर भी, मौसमी फसल‑आधारित आपूर्ति, कीमत‑स्थिरता, और ग्रामीण किसानों की भागीदारी को सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती बनी हुई है।

विशेषज्ञों की राय

ऊर्जा विशेषज्ञ डॉ. राकेश मेहता का मानना है कि “यदि E20 को सस्ती कीमत पर बेचा गया तो सरकार को ऊर्जा सब्सिडी में भारी खर्च करना पड़ेगा, जिससे अन्य सामाजिक योजनाओं पर दबाव बढ़ेगा। इसलिए मूल्य‑संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।” साथ ही, कृषि प्रतिनिधियों ने कहा कि ईथनॉल उत्पादन में स्थायी निवेश और न्यूनतम मूल्य‑सुरक्षा प्रावधानों से किसान का भरोसा बढ़ेगा।