एक नए अध्ययन के अनुसार, भारत के महानगरों में रहने वाले लोग रात के बढ़ते तापमान के कारण सालाना 65 से 93 घंटे की नींद खो रहे हैं। चेन्नई इस सूची में सबसे ऊपर है, जो स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • भारत के बड़े शहरों में लोग सालाना 65 से 93 घंटे की नींद खो रहे हैं।
  • चेन्नई में नींद का नुकसान सबसे अधिक (93 घंटे) दर्ज किया गया है।
  • रात के बढ़ते तापमान का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से पाया गया है।
  • नींद की कमी से हृदय रोग, स्ट्रोक और मानसिक थकान का खतरा बढ़ जाता है।

भारत के प्रमुख महानगरों में रहने वाले नागरिकों के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आई है। अमेरिकी जलवायु वकालत समूह 'क्लाइमेट सेंट्रल' (Climate Central) द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के कारण रात के बढ़ते तापमान ने लोगों की नींद में भारी सेंध लगा दी है। अध्ययन के अनुसार, भारत के बड़े शहरों में रहने वाले लोग प्रति वर्ष औसतन 65 से 93 घंटे की नींद खो रहे हैं।

शहरों की स्थिति: चेन्नई और मुंबई का हाल

अध्ययन में पाया गया कि चेन्नई भारत का वह शहर है जहाँ नींद का नुकसान सबसे अधिक है। यहाँ के निवासी सालाना औसतन 93 घंटे की नींद गंवा रहे हैं, जिसमें से 5 घंटे सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन के कारण हैं। इसके बाद मुंबई (84 घंटे) और कोलकाता (80 घंटे) का स्थान आता है। हालांकि, दिल्ली और चंडीगढ़ में नींद का नुकसान तुलनात्मक रूप से कम (क्रमशः 67 और 62 घंटे) पाया गया है।

जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य का घातक संबंध

विशेषज्ञों का कहना है कि रात के समय तापमान में होने वाली असामान्य वृद्धि मानव शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक है। जब रातें गर्म होती हैं, तो शरीर दिन के दौरान हुई गर्मी से उबरने और खुद को ठंडा करने में असमर्थ हो जाता है। नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल (NRDC) के विशेषज्ञ अभियंत तिवारी के अनुसार, इस स्थिति से चिड़चिड़ापन, मानसिक और शारीरिक थकान बढ़ रही है।

दीर्घकालिक प्रभाव और जोखिम

नींद की इस कमी का असर केवल थकान तक सीमित नहीं है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, खराब गुणवत्ता वाली नींद से स्ट्रोक, हृदय संबंधी रोग (Cardiovascular conditions) और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। यह जीवन प्रत्याशा (Life expectancy) को भी कम कर सकता है। अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि दुनिया भर में दिन की तुलना में रात के तापमान में वृद्धि की दर अधिक तेज है, जो वैश्विक स्तर पर एक गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल की ओर इशारा करती है।