एक चौंकाने वाले अध्ययन ने खुलासा किया है कि 1799 के बाद से दिल्ली में यमुना नदी की चौड़ाई 68% कम हो गई है और इसका जल प्रवाह 89% तक गिर गया है। शहरीकरण और मानवीय हस्तक्षेप ने नदी के प्राकृतिक स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- यमुना की चौड़ाई 1799 में 658 मीटर से घटकर 2024 में मात्र 210 मीटर रह गई है।
- नदी का जल प्रवाह (Discharge) 30,000 घन मीटर प्रति सेकंड से गिरकर 3,900 घन मीटर प्रति सेकंड हो गया है।
- ब्रिटिश काल के बैराजों और आधुनिक शहरी विकास ने नदी के प्राकृतिक बहाव को बाधित किया है।
- बाढ़ के मैदानों (Floodplains) पर अतिक्रमण के कारण दिल्ली में बाढ़ का खतरा अत्यधिक बढ़ गया है।
दिल्ली की जीवन रेखा कही जाने वाली यमुना नदी एक गंभीर पारिस्थितिक संकट से गुजर रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय और भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER), भोपाल के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अभूतपूर्व अध्ययन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पिछले दो शताब्दियों में यमुना का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। 1799 के ऐतिहासिक मानचित्रों और आधुनिक उपग्रह चित्रों के विश्लेषण से पता चला है कि नदी की चौड़ाई में 68% की कमी आई है और इसके जल प्रवाह में 89% की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
ऐतिहासिक बदलाव और शहरीकरण का प्रभाव
शोधकर्ताओं ने 1799 के 'अपजॉन मानचित्र' का उपयोग करके नदी की तुलना की, जो किसी भी बैराज के निर्माण से पहले की प्राकृतिक स्थिति को दर्शाता है। अध्ययन के अनुसार, 1799 में यमुना की औसत चौड़ाई लगभग 658 मीटर थी, जो 2024 तक घटकर केवल 210 मीटर रह गई है। यह गिरावट मुख्य रूप से दिल्ली की जनसंख्या में हुई अभूतपूर्व वृद्धि का परिणाम है। जहाँ 19वीं सदी की शुरुआत में दिल्ली की आबादी मात्र 2.5 लाख थी, वहीं आज यह 2.15 करोड़ के पार पहुँच चुकी है।
मानवीय हस्तक्षेप: बैराज और अतिक्रमण
अध्ययन में बताया गया है कि 1873 में ब्रिटिश काल के दौरान निर्मित ताजेश्वर बैराज से लेकर आधुनिक वजीराबाद और ओखला बैराज तक, मानवीय संरचनाओं ने नदी के प्रवाह को नियंत्रित और बाधित किया है। इन संरचनाओं ने पानी के बड़े हिस्से को ऊपर की ओर मोड़ दिया, जिससे दिल्ली के हिस्से में पानी की मात्रा नाटकीय रूप से कम हो गई। इसके अलावा, शहर को बाढ़ से बचाने के लिए बनाए गए तटबंधों (Embankments) के कारण लगभग 45 वर्ग किलोमीटर के बाढ़ के मैदान अलग-थलग पड़ गए हैं, जिनका उपयोग अब खेती और शहरी विकास के लिए किया जा रहा है।
बाढ़ का बढ़ता खतरा
विडंबना यह है कि नदी के संकुचित होने के कारण दिल्ली में बाढ़ का खतरा और भी बढ़ गया है। शोधकर्ताओं ने जुलाई 2023 की विनाशकारी बाढ़ का उदाहरण देते हुए बताया कि हालांकि 2023 में पानी का प्रवाह 1978 की तुलना में कम था, फिर भी नदी का जलस्तर काफी ऊंचा था। इसका कारण यह है कि नदी अब बहुत संकरी हो चुकी है, जिससे अतिरिक्त पानी को फैलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिलती। नदी के भीतर प्राकृतिक रेत के द्वीपों (Channel bars) का क्षेत्रफल भी 1985 के 20 वर्ग किमी से घटकर 2020 में मात्र 4 वर्ग किमी रह गया है, जो नदी के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है।