मछुआरे और संरक्षणवादी परयिल राजन केरल के कन्नूर में दुर्लभ 'कन्नम्पोट्टी' मैंग्रोव को विलुप्त होने से बचाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने एक अकेले पौधे से 2,000 पौधे तैयार कर एक मिसाल पेश की है।

  • परयिल राजन ने एक दुर्लभ मैंग्रोव पौधे से 2,000 पौधों की नर्सरी तैयार की है।
  • कन्नम्पोट्टी (Excoecaria agallocha) प्रजाति कन्नूर के तटीय इलाकों से गायब हो रही है।
  • मैंग्रोव तटीय सुरक्षा और समुद्री जीवों के प्रजनन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  • प्लास्टिक प्रदूषण इन नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है।

केरल के कन्नूर के तटीय इलाकों में एक मौन क्रांति चल रही है। मछुआरे और समर्पित संरक्षणवादी परयिल राजन, जिन्हें स्थानीय लोग 'कंडल राजन' के नाम से जानते हैं, पिछले चार दशकों से मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा कर रहे हैं। उनका नवीनतम और सबसे महत्वपूर्ण मिशन कन्नम्पोट्टी (Excoecaria agallocha) नामक एक दुर्लभ मैंग्रोव किस्म को बचाना है, जिसके बारे में उन्हें डर है कि यह जिले के तटीय परिदृश्य से पूरी तरह गायब हो सकता है।

यह चुनौती अत्यंत कठिन थी। राजन ने पाया कि यह किस्म अब केवल कुछ ही स्थानों पर बची है। धैर्य और सटीकता के साथ, उन्होंने एक अकेले पौधे की निगरानी की और उसके नन्हे बीजों को एकत्र किया। इन बीजों को उन्होंने थवम स्थित अपने घर की नर्सरी में पाला, जहाँ उन्होंने 2,000 से अधिक पौधे तैयार किए हैं। यह उन लोगों के लिए एक नई उम्मीद है जो इस प्रजाति को पहचान तक नहीं पाते थे।

जीवविज्ञान और उत्तरजीविता

कन्नम्पोट्टी पौधे की जैविक विशेषताएं विशिष्ट हैं। अनुकूल परिस्थितियों में इसके बीज लगभग दो सप्ताह में अंकुरित हो जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि छोटा पौधा बढ़ने के दौरान पोषण के लिए मूल बीज से जुड़ा रहता है। हालांकि, यह पौधा खतरनाक भी हो सकता है; इसका दूधिया रस अम्लीय होता है और त्वचा के संपर्क में आने पर जलन पैदा कर सकता है। स्थानीय स्तर पर इसके औषधीय उपयोग और कैंसर के इलाज के दावे किए जाते हैं, लेकिन अभी तक इनका वैज्ञानिक सत्यापन नहीं हुआ है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, कन्नम्पोट्टी जैसी विशिष्ट मैंग्रोव किस्मों का लुप्त होना तटीय जैव विविधता के संतुलन को बिगाड़ देता है। मैंग्रोव केवल पेड़ नहीं हैं, बल्कि वे 'बायोलॉजिकल इंजीनियर' हैं जो मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और मछलियों, झींगों और केकड़ों के लिए प्रजनन स्थल प्रदान करते हैं। इस प्रजाति की कमी स्थानीय मत्स्य अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल सकती है।

"केवल मैंग्रोव लगाना पर्याप्त नहीं है; दीर्घकालिक उत्तरजीविता सुनिश्चित करने के लिए उनके आसपास के वातावरण को प्रदूषण से बचाना होगा।"

वनस्पति बचाव के अलावा, राजन का कार्य आधुनिक संकट यानी प्लास्टिक प्रदूषण को भी उजागर करता है। अपनी डोंगी (canoe) से यात्रा करते समय, वह अक्सर जड़ों में फंसे प्लास्टिक की बोतलें पाते हैं। राजन शुष्क मौसम के दौरान खुद इस कचरे को साफ करते हैं ताकि मानसून के दौरान यह समुद्र में न जाए और पारिस्थितिकी तंत्र का दम न घुट जाए।

केरल वन विभाग कन्नूर को राज्य में सबसे बड़े मैंग्रोव विस्तार वाले जिले के रूप में पहचानता है और इन्हें प्राकृतिक तटीय रक्षा कवच मानता है। सहायक वन संरक्षक एम. राजीवन ने पुष्टि की कि आवास विनाश के कारण Excoecaria agallocha की संख्या में भारी गिरावट आई है, जिससे राजन की निजी नर्सरी अब एक महत्वपूर्ण संसाधन बन गई है।

क्या आप जानते हैं?: मैंग्रोव दुनिया के उन दुर्लभ पेड़ों में से हैं जो खारे पानी में जीवित रहने के लिए नमक को छानकर अलग करने की क्षमता रखते हैं!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: कन्नम्पोट्टी मैंग्रोव क्या है?
उत्तर: यह मैंग्रोव की एक दुर्लभ किस्म है जिसे वैज्ञानिक रूप से Excoecaria agallocha कहा जाता है, जो मुख्य रूप से केरल के कन्नूर क्षेत्र में पाया जाता है।

प्रश्न: तटीय क्षेत्रों के लिए मैंग्रोव क्यों जरूरी हैं?
उत्तर: वे समुद्री तूफानों के खिलाफ प्राकृतिक दीवार का काम करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और समुद्री जीवों को सुरक्षित प्रजनन स्थल प्रदान करते हैं।